रोहिताश्व की पौराणिक परंपरा, 7वीं शताब्दी के अभिलेख, शेरशाह सूरी की रणनीति और स्वतंत्रता संग्राम तक—रोहतासगढ़ किला आज भी अपने भीतर इतिहास की कई परतें समेटे खड़ा है
न्यूज़ डेस्क : रोहतास | दैनिक भारतवर्ष
सासाराम: कैमूर की दुर्गम पहाड़ियों पर स्थित रोहतासगढ़ किला बिहार ही नहीं, भारतीय इतिहास के उन विशाल दुर्गों में शामिल है, जिनका अतीत लोककथाओं, पुरातात्विक प्रमाणों, राजवंशों और युद्धों से जुड़ा हुआ है। सत्ययुग से जुड़े राजा हरिश्चंद्र और उनके पुत्र रोहिताश्व की पौराणिक परंपरा से लेकर शेरशाह सूरी, मुगल शासन और स्वतंत्रता संग्राम तक, रोहतासगढ़ का इतिहास कई युगों की कहानी कहता है।
हालांकि, इतिहास को तथ्यों के आधार पर समझना जरूरी है। रोहिताश्व द्वारा रोहतासगढ़ बसाए जाने की कथा व्यापक लोकमान्यता और पौराणिक परंपरा का हिस्सा है, लेकिन उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों के आधार पर किले के प्रारंभिक इतिहास का प्रमाणित उल्लेख लगभग 7वीं शताब्दी ईस्वी से मिलता है। यही अंतर रोहतासगढ़ के इतिहास को और अधिक रोचक बनाता है—जहां आस्था, परंपरा और प्रमाणित इतिहास एक-दूसरे के समानांतर दिखाई देते हैं।

सत्ययुग और रोहिताश्व से जुड़ी प्राचीन मान्यता
रोहतास जिले की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, रोहतासगढ़ का नाम सूर्यवंशी राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व से जोड़ा जाता है। स्थानीय परंपरा में माना जाता है कि रोहिताश्व ने यहां अपना निवास अथवा दुर्ग स्थापित किया और इसी नाम से आगे चलकर रोहतास क्षेत्र की पहचान बनी।
हरिश्चंद्र और रोहिताश्व से जुड़ी कथा भारतीय पौराणिक परंपरा में प्रसिद्ध है। बिहार पर्यटन विभाग भी रोहतासगढ़ से रोहिताश्व की लोककथा को जोड़ता है। परंतु विभाग के ऐतिहासिक विवरण में यह भी स्पष्ट किया गया है कि किले पर ऐसे प्रारंभिक पुरातात्विक अवशेष नहीं मिले हैं, जो पौराणिक काल के इन शासकों की ऐतिहासिक उपस्थिति को प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित कर सकें।
इसलिए रोहतासगढ़ के इतिहास में रोहिताश्व का काल पौराणिक एवं लोकपरंपरा का हिस्सा है, जबकि 7वीं शताब्दी के बाद के अभिलेख प्रमाणित इतिहास की श्रेणी में आते हैं।
रोहतासगढ़ का पहला प्रमाणित ऐतिहासिक संकेत: 7वीं शताब्दी
रोहतासगढ़ के इतिहास का सबसे पुराना उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाण एक शिलालेख अथवा अभिलेखीय संकेत से जुड़ा माना जाता है, जिसे 7वीं शताब्दी ईस्वी का माना गया है। बिहार पर्यटन विभाग के विवरण के अनुसार, यह अभिलेख शशांकदेव के शासनकाल से संबंधित माना जाता है।
शशांक को प्राचीन बंगाल के कर्णसुवर्ण क्षेत्र का शक्तिशाली शासक माना जाता है। रोहतासगढ़ परिसर में मिले अभिलेखीय प्रमाण से यह संकेत मिलता है कि 7वीं शताब्दी तक यह क्षेत्र राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बन चुका था।
यही वह बिंदु है, जहां रोहतासगढ़ की पौराणिक कथा से प्रमाणित इतिहास की यात्रा अधिक स्पष्ट रूप से शुरू होती है।
12वीं और 13वीं शताब्दी: स्थानीय राजसत्ता और शिलालेखों के प्रमाण
रोहतासगढ़ के इतिहास में 12वीं शताब्दी के कई महत्वपूर्ण अभिलेखों का उल्लेख मिलता है। बिहार पर्यटन विभाग के अनुसार, फूलवारी क्षेत्र में 1169 ईस्वी का एक अभिलेख मिला है, जिसमें स्थानीय शासक प्रतापधवल द्वारा पहाड़ी पर मार्ग निर्माण कराए जाने का उल्लेख है।
प्रतापधवल को खयरवाल अथवा खयरवाला वंश से जोड़ा जाता है। रोहतास क्षेत्र की स्थानीय जनजातीय और सामाजिक परंपराओं में खड़वार, उरांव और चेरो समुदायों की भी रोहतासगढ़ से ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्मृतियां जुड़ी हुई हैं।
इसके बाद 1223 ईस्वी का एक अन्य अभिलेख लाल दरवाजा क्षेत्र से संबंधित बताया जाता है। इन अभिलेखों से यह स्पष्ट होता है कि मध्यकाल से पहले भी रोहतासगढ़ केवल एक निर्जन पहाड़ी क्षेत्र नहीं था, बल्कि यहां राजनीतिक नियंत्रण, मार्ग निर्माण और दुर्गीय व्यवस्था मौजूद थी।

दुर्गम भूगोल ने बनाया रोहतासगढ़ को लगभग अजेय
रोहतासगढ़ किले की सबसे बड़ी ताकत उसका प्राकृतिक भूगोल रहा है। यह दुर्ग पहाड़ी पठार पर स्थित है और चारों ओर से दुर्गम रास्तों तथा प्राकृतिक अवरोधों से घिरा रहा है।
जिला प्रशासन के विवरण के अनुसार, प्राचीन समय में रोहतासगढ़ की पहाड़ी तक पहुंचने के लिए चार प्रमुख मार्ग माने जाते थे—
- पूर्व दिशा में मेढ़ा या मेंडारा घाट
- पश्चिम दिशा में कठौतिया घाट
- उत्तर दिशा में घोड़ा घाट
- दक्षिण दिशा में राजघाट
इन सीमित मार्गों पर निगरानी रखने के कारण किले की सुरक्षा व्यवस्था अत्यंत मजबूत थी। बिहार पर्यटन विभाग के अनुसार, किले तक पहुंचने के लिए पहाड़ी पर बने हजारों चूना-पत्थर के सीढ़ीनुमा रास्तों से होकर जाना पड़ता है।
इसी प्राकृतिक सुरक्षा ने रोहतासगढ़ को लंबे समय तक एक महत्वपूर्ण सामरिक दुर्ग बनाए रखा।
शेरशाह सूरी और रोहतासगढ़: 16वीं शताब्दी का निर्णायक दौर
रोहतासगढ़ के इतिहास का सबसे चर्चित दौर 16वीं शताब्दी में आया, जब अफगान शासक शेरशाह सूरी ने इस दुर्ग को अपने नियंत्रण में लिया। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के पटना सर्किल के अनुसार, रोहतासगढ़ लंबे समय तक हिंदू शासकों के नियंत्रण में रहने के बाद 1538 ईस्वी में शेरशाह के कब्जे में आया।
रोहतासगढ़ की दुर्गमता इतनी अधिक थी कि इसे बलपूर्वक जीतना कठिन माना जाता था। शेरशाह द्वारा किले पर नियंत्रण पाने से जुड़ी कई लोककथाएं और ऐतिहासिक विवरण प्रचलित हैं। इनमें डोलियों के माध्यम से सैनिकों को किले में प्रवेश कराने की प्रसिद्ध कथा भी शामिल है।
किले पर अधिकार के बाद शेरशाह के शासनकाल में यहां कई संरचनाओं का निर्माण और विस्तार हुआ। आज भी किले में शेरशाही काल से जुड़ी मस्जिदें और अन्य स्थापत्य अवशेष मौजूद हैं।
मुगल सत्ता और रोहतासगढ़
शेरशाह सूरी के बाद रोहतासगढ़ का राजनीतिक महत्व समाप्त नहीं हुआ। बाद के दौर में यह मुगल सत्ता के नियंत्रण में आया। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के अनुसार, शेरशाह के बाद यह किला मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में मुगल नियंत्रण में पहुंचा।
मुगल काल में भी रोहतासगढ़ का महत्व मुख्य रूप से उसकी सामरिक स्थिति के कारण बना रहा। पहाड़ी पठार पर स्थित यह किला आसपास के बड़े भूभाग पर निगरानी और सैन्य नियंत्रण के लिए उपयोगी था।
किले के भीतर बने महल, प्रवेश द्वार, धार्मिक स्थल, जलाशय और प्रशासनिक संरचनाएं इसके लंबे राजनीतिक इतिहास की गवाही देती हैं।

किले के भीतर आज भी मौजूद हैं इतिहास के निशान
रोहतासगढ़ किले का परिसर केवल एक सैन्य संरचना नहीं है। यहां विभिन्न कालखंडों की स्थापत्य परंपराओं के अवशेष मिलते हैं।
जिला प्रशासन के अनुसार, किले में प्रमुख रूप से रोहितासन अथवा चौरासन सीढ़ी मंदिर, पार्वती मंदिर, सिंह दरवाजा, लाल दरवाजा, गाजी दरवाजा, राजभवन, किलेदार महल, पंचमहल, हथियापोल, फूलमहल, बारादरी, रानी महल, नाचघर, शेरशाही मस्जिद, हब्स खान से संबंधित संरचनाएं, गणेश मंदिर और अन्य स्मारक मौजूद हैं।
इन संरचनाओं में अलग-अलग समय की स्थापत्य परंपराओं की झलक दिखाई देती है। यही कारण है कि रोहतासगढ़ केवल एक किला नहीं, बल्कि कई शताब्दियों के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास का विशाल परिसर है।
स्वतंत्रता संग्राम में भी रोहतासगढ़ की भूमिका
रोहतासगढ़ का महत्व मध्यकाल तक सीमित नहीं रहा। 19वीं शताब्दी में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष के दौरान भी इस दुर्गम क्षेत्र का महत्व सामने आया।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम और उसके बाद के संघर्षों के संदर्भ में रोहतासगढ़ तथा कैमूर की पहाड़ियों को छापामार गतिविधियों और प्रतिरोध से जोड़ा जाता है। स्थानीय इतिहास में बाबू कुंवर सिंह के भाई अमर सिंह के संघर्ष का उल्लेख रोहतास क्षेत्र की पहाड़ियों और दुर्गम इलाकों से जुड़ा हुआ मिलता है।
किले और आसपास की पहाड़ियों की भौगोलिक स्थिति ने प्रतिरोध करने वाले समूहों को रणनीतिक लाभ दिया। इस प्रकार रोहतासगढ़ का इतिहास राजाओं और साम्राज्यों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष की स्मृतियों से भी जुड़ गया।

‘सत्ययुग से आज तक’ की कहानी को कैसे समझें?
रोहतासगढ़ के इतिहास को समझने के लिए पौराणिक परंपरा और प्रमाणित इतिहास के बीच अंतर करना आवश्यक है।
लोक और पौराणिक परंपरा रोहिताश्व और राजा हरिश्चंद्र से रोहतासगढ़ की स्थापना को जोड़ती है।
प्रमाणित ऐतिहासिक साक्ष्य किले के इतिहास को कम से कम 7वीं शताब्दी ईस्वी तक स्पष्ट रूप से ले जाते हैं।
इसके बाद 12वीं और 13वीं शताब्दी के अभिलेख स्थानीय शासन और प्रशासनिक गतिविधियों की पुष्टि करते हैं। 16वीं शताब्दी में शेरशाह सूरी का नियंत्रण और बाद में मुगल शासन इस दुर्ग के इतिहास को व्यापक भारतीय राजनीतिक घटनाक्रम से जोड़ता है।
औपनिवेशिक काल और स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृतियों के बाद आज रोहतासगढ़ एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और पर्यटन स्थल के रूप में मौजूद है।
आज भी इतिहास और प्रकृति का अद्भुत संगम है रोहतासगढ़
बिहार सरकार के पर्यटन विभाग के अनुसार, रोहतासगढ़ किला समुद्र तल से लगभग 1500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। दुर्गम चढ़ाई, घने जंगल, पहाड़ी भूगोल और विशाल ऐतिहासिक परिसर इसे सामान्य पर्यटन स्थल से अलग बनाते हैं।
आज भी यहां पहुंचने वाले पर्यटक प्राचीन द्वारों, खंडहरों, मंदिरों, मस्जिदों, महलों और जल संरचनाओं के बीच इतिहास की अलग-अलग परतों को देख सकते हैं।
रोहतासगढ़ की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहां एक ही स्थान पर पौराणिक स्मृति, प्राचीन अभिलेख, मध्यकालीन सत्ता संघर्ष, अफगान और मुगल स्थापत्य तथा स्वतंत्रता संघर्ष की यादें एक साथ दिखाई देती हैं।
दैनिक भारतवर्ष का निष्कर्ष
रोहतासगढ़ किले की कहानी को केवल यह कहकर समेटना संभव नहीं है कि इसका निर्माण किसी एक राजा ने कराया था। इसका इतिहास कई कालखंडों की परतों से बना है।
रोहिताश्व और राजा हरिश्चंद्र से जुड़ी कथा इसकी सांस्कृतिक और पौराणिक पहचान है। 7वीं शताब्दी के अभिलेख इसके प्रमाणित प्राचीन इतिहास की शुरुआत का महत्वपूर्ण आधार हैं। 12वीं-13वीं शताब्दी के शिलालेख स्थानीय राजसत्ता की जानकारी देते हैं, जबकि शेरशाह सूरी और मुगल काल इसे भारतीय मध्यकालीन इतिहास से जोड़ते हैं।
आज खंडहरों में खड़ा रोहतासगढ़ किला बिहार के अतीत की ऐसी जीवंत विरासत है, जो यह बताती है कि इतिहास केवल किताबों में नहीं होता—वह पहाड़ों, पत्थरों, शिलालेखों और पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियों में भी जीवित रहता है।
दैनिक भारतवर्ष ‘व्यूज़ नहीं, न्यूज़ की बात’















