उज्बेकिस्तान के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने के बाद पीएम मोदी 31 अगस्त से SCO शिखर सम्मेलन में होंगे शामिल; सुरक्षा, कनेक्टिविटी और आर्थिक अवसर भारत की प्राथमिकता
न्यूज़ डेस्क : नई दिल्ली | दैनिक भारतवर्ष
भारत की नई ग्लोबल डिप्लोमेसी, ताशकंद के बाद बिश्केक में मोदी की बड़ी कूटनीतिक परीक्षा; SCO पर दुनिया की नजर
नई दिल्ली: वैश्विक राजनीति में तेजी से बदलते समीकरणों के बीच भारत की विदेश नीति एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान यात्रा को भारत की मध्य एशिया नीति और व्यापक वैश्विक कूटनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है। ताशकंद में 29-30 अगस्त की द्विपक्षीय यात्रा के बाद प्रधानमंत्री मोदी 31 अगस्त से 1 सितंबर तक किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित होने वाले 26वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे।
यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब दुनिया में अमेरिका, चीन, रूस और यूरोप के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज है और भारत लगातार अपने लिए व्यापक कूटनीतिक तथा आर्थिक विकल्प मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
ताशकंद में भारत-उज्बेकिस्तान संबंधों को नई दिशा
प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश, रक्षा, डिजिटल कनेक्टिविटी, ऊर्जा, शिक्षा तथा लोगों के बीच संपर्क जैसे क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया। भारत और उज्बेकिस्तान ने अपने विकास के दीर्घकालिक लक्ष्यों के बीच तालमेल बढ़ाने पर भी चर्चा की।
मध्य एशिया भारत के लिए केवल कूटनीतिक क्षेत्र नहीं, बल्कि ऊर्जा, व्यापार, संपर्क और रणनीतिक सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में उज्बेकिस्तान के साथ संबंधों को मजबूत करना भारत की क्षेत्रीय रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।
अब बिश्केक पर निगाहें, शुरू होगा SCO का अहम दौर
ताशकंद के बाद प्रधानमंत्री मोदी बिश्केक पहुंचेंगे, जहां 31 अगस्त और 1 सितंबर को SCO का 26वां शिखर सम्मेलन आयोजित होना है। भारत 2017 से SCO का पूर्ण सदस्य है और इस वर्ष का सम्मेलन संगठन की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर हो रहा है।
भारत ने SCO के लिए अपनी प्राथमिकताओं को ‘सुरक्षा, कनेक्टिविटी और अवसर’ के रूप में रेखांकित किया है। प्रधानमंत्री मोदी सम्मेलन को संबोधित करेंगे और SCO देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय मुलाकातें भी प्रस्तावित हैं।
यही वजह है कि बिश्केक बैठक को भारत की विदेश नीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, सम्मेलन अभी शुरू नहीं हुआ है, इसलिए इसके संभावित फैसलों को पहले से तय परिणाम के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
रूस और चीन के साथ संतुलन पर भी नजर
SCO की बैठक का एक महत्वपूर्ण पहलू भारत के रूस और चीन के साथ संबंध हैं। रूस के साथ भारत के लंबे समय से रणनीतिक और रक्षा संबंध हैं, जबकि चीन के साथ सीमा विवाद के बावजूद दोनों देशों के बीच राजनयिक और सैन्य संवाद जारी है।
भारत सरकार की ओर से उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी SCO के दौरान सदस्य देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें करेंगे। हालांकि, हर संभावित बैठक या उसके एजेंडे को लेकर आधिकारिक पुष्टि को ही अंतिम आधार माना जाना चाहिए।
भारत के लिए चुनौती यह है कि वह रूस, चीन, अमेरिका, यूरोप और मध्य एशिया के साथ अपने संबंधों को किसी एक खेमे तक सीमित किए बिना राष्ट्रीय हितों के आधार पर आगे बढ़ाए।
अमेरिका की नीतियों के बीच भारत के लिए बढ़ी कूटनीतिक चुनौती
इस समय भारत-अमेरिका संबंध भी वैश्विक व्यापार और रणनीतिक नीतियों के कारण चर्चा में हैं। 30 अगस्त को प्रकाशित एक रिपोर्ट में पूर्व राजनयिक राजीव डोगरा ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के प्रभावों को लेकर भारत के सामने मौजूद चुनौतियों पर टिप्पणी की है। उनके अनुसार भारत अमेरिकी सहायता या सुरक्षा पर निर्भर नहीं है, लेकिन अमेरिकी नीतियों के प्रभावों से पूरी तरह अछूता भी नहीं रह सकता।
यह टिप्पणी एक पूर्व राजनयिक का आकलन है, इसे भारत सरकार का आधिकारिक मत नहीं माना जाना चाहिए। फिर भी यह उस व्यापक बहस को रेखांकित करती है जिसमें भारत की विदेश नीति को बदलते बहुध्रुवीय वैश्विक वातावरण के संदर्भ में देखा जा रहा है।
क्या भारत अमेरिका से दूरी और रूस-चीन के करीब जा रहा है?
मौजूदा घटनाक्रम को केवल इस रूप में देखना कि भारत किसी एक देश से दूरी बनाकर दूसरे गुट में जा रहा है, तस्वीर को अत्यधिक सरल बना देगा।
भारत की विदेश नीति में एक साथ कई दिशाओं में संबंध मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है। मध्य एशिया में सक्रियता, रूस के साथ रणनीतिक संबंध, चीन के साथ संवाद और अमेरिका तथा यूरोपीय देशों के साथ आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग—इन सभी को भारत अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संतुलित करने की कोशिश कर रहा है।
हाल की रिपोर्टों में प्रधानमंत्री मोदी के लगातार विदेश दौरों को भी इसी व्यापक कूटनीतिक रणनीति से जोड़कर देखा गया है।
SCO के बाद भारत की अगली बड़ी कूटनीतिक परीक्षा
बिश्केक में होने वाला SCO सम्मेलन भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद सितंबर में नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन प्रस्तावित है। इस तरह आने वाले दिनों में भारत को एक के बाद एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंचों पर अपनी प्राथमिकताएं रखने का अवसर मिलेगा।
भारत के सामने मुख्य चुनौती केवल बड़े देशों के साथ संबंध बनाए रखना नहीं, बल्कि व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीक, रक्षा, आतंकवाद और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों पर अपने हितों को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाना है।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदा मध्य एशिया यात्रा को भारत की बढ़ती वैश्विक सक्रियता के संदर्भ में देखा जा सकता है। ताशकंद में उज्बेकिस्तान के साथ संबंधों को मजबूत करने के बाद बिश्केक में SCO मंच पर भारत की प्राथमिकताएं सामने आएंगी।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि SCO शिखर सम्मेलन 31 अगस्त से शुरू होना है और उसके परिणाम अभी सामने नहीं आए हैं। इसलिए भारत-रूस-चीन या भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय सम्मेलन में होने वाली वास्तविक बैठकों और फैसलों का इंतजार करना अधिक उचित होगा।
दैनिक भारतवर्ष का निष्पक्ष दृष्टिकोण:
भारत की मौजूदा विदेश नीति को किसी एक शक्ति-गुट की ओर झुकाव के बजाय बदलती वैश्विक परिस्थितियों में अपने रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा हितों के लिए अधिक विकल्प तैयार करने की कोशिश के रूप में देखना ज्यादा उचित है।


















