आज जिस 26 जनवरी को हम गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं, उसी तारीख को 1930 में रोहतास क्षेत्र में पूर्ण स्वराज्य की शपथ और स्वाधीनता दिवस के आयोजन हुए थे; यह कहानी उस दौर के स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष और त्याग से जुड़ी है।
न्यूज़ डेस्क : रोहतास | विशेष रिपोर्ट | दैनिक भारतवर्ष
सासाराम: भारत में 26 जनवरी का नाम लेते ही आज हमारे सामने गणतंत्र दिवस की तस्वीर उभरती है। लेकिन आज से करीब 96 साल पहले यही तारीख एक अलग ही अर्थ लेकर आई थी। वर्ष 1930 में 26 जनवरी को देशभर में पूर्ण स्वराज्य दिवस यानी स्वाधीनता दिवस मनाया गया था। उस समय भारत अभी ब्रिटिश शासन के अधीन था और आजादी हासिल करना देशवासियों का सबसे बड़ा संकल्प बन चुका था।
इस ऐतिहासिक अभियान की गूंज रोहतास क्षेत्र में भी सुनाई दी थी। उपलब्ध स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार उस समय के शाहाबाद क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सासाराम, डेहरी, नासरीगंज और बिक्रमगंज सहित कई स्थानों पर 26 जनवरी 1930 को स्वाधीनता दिवस के आयोजन किए गए।
यही वह इतिहास है, जिसे आज की पीढ़ी के सामने फिर से लाने की जरूरत है।

26 जनवरी 1930 को आखिर क्यों मनाया गया था स्वाधीनता दिवस?
इस कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में 1929 का लाहौर अधिवेशन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य बनाया और इसके बाद 26 जनवरी 1930 को देशभर में लोगों से स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा लेने और स्वाधीनता दिवस मनाने का आह्वान किया गया।
उस समय भारत स्वतंत्र नहीं था। इसलिए 26 जनवरी का अर्थ आज के गणतंत्र दिवस से बिल्कुल अलग था। यह दिन ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वतंत्रता हासिल करने के संकल्प का प्रतीक बना।
रोहतास क्षेत्र भी इस राष्ट्रीय चेतना से अलग नहीं रहा। स्थानीय विवरण बताते हैं कि 1930 में इस क्षेत्र के अलग-अलग स्थानों पर स्वाधीनता दिवस के कार्यक्रम आयोजित किए गए थे।
रोहतास में कैसे पहुंची आजादी की यह आवाज?
आज का रोहतास जिला स्वतंत्रता आंदोलन के समय अस्तित्व में नहीं था। रोहतास जिला वर्ष 1972 में बना। स्वतंत्रता संग्राम के दौर में वर्तमान रोहतास का बड़ा हिस्सा तत्कालीन शाहाबाद जिले का हिस्सा था।
इसलिए जब हम रोहतास के स्वतंत्रता आंदोलन की बात करते हैं तो उस समय के शाहाबाद क्षेत्र के ऐतिहासिक संदर्भ को भी समझना जरूरी है।
स्थानीय इतिहास संबंधी स्रोतों में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक इस क्षेत्र के सेनानियों की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख मिलता है।
सासाराम से लेकर बिक्रमगंज तक दिखा था देशभक्ति का जोश
26 जनवरी 1930 केवल किसी एक शहर का कार्यक्रम नहीं था। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में सासाराम, डेहरी, नासरीगंज और बिक्रमगंज सहित क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर स्वाधीनता दिवस मनाए जाने का उल्लेख मिलता है।
इन आयोजनों का उद्देश्य सिर्फ सभा करना नहीं था। यह अंग्रेजी शासन के सामने भारतीयों की राजनीतिक चेतना और पूर्ण स्वराज्य की मांग को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने का माध्यम था।
उस दौर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ खुलकर राजनीतिक गतिविधियां करना आसान नहीं था। ऐसे माहौल में स्थानीय स्तर पर लोगों का एकजुट होना स्वतंत्रता आंदोलन की जड़ों के मजबूत होने का संकेत था।
इससे पहले भी रोहतास की धरती ने अंग्रेजों को दी थी चुनौती
रोहतास क्षेत्र की स्वतंत्रता संघर्ष की कहानी केवल 1930 से शुरू नहीं होती।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भी इस इलाके के लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ मोर्चा लिया था। स्थानीय ऐतिहासिक स्रोतों में निशान सिंह को वीर कुंवर सिंह का सहयोगी और स्वतंत्रता सेनानी बताया गया है।
1857 का विद्रोह भले ही अंततः अंग्रेजों द्वारा दबा दिया गया, लेकिन इसने भारतीय समाज में अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रतिरोध की मजबूत भावना पैदा कर दी थी।
रोहतास और आसपास का पहाड़ी इलाका भी इस संघर्ष के लिए महत्वपूर्ण रहा। वीर कुंवर सिंह के भाई अमर सिंह से जुड़े संघर्ष और रोहतासगढ़ क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति का उल्लेख स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में मिलता है।
गांधी के आंदोलन से गांव-गांव पहुंची स्वतंत्रता की चेतना
1857 के बाद स्वतंत्रता आंदोलन का स्वरूप धीरे-धीरे बदलता गया। महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन और बाद में सविनय अवज्ञा आंदोलन ने स्वतंत्रता की लड़ाई को आम लोगों तक पहुंचाया।
रोहतास क्षेत्र में भी राष्ट्रीय आंदोलन की गतिविधियां बढ़ीं। 1930 का स्वाधीनता दिवस इसी राजनीतिक जागरण की एक महत्वपूर्ण कड़ी था।
यह वह समय था जब स्वतंत्रता केवल नेताओं की मांग नहीं रह गई थी। आम लोग भी इसे अपने भविष्य और अधिकार से जोड़कर देखने लगे थे।

1930 का वह संकल्प आगे चलकर 1942 में आंदोलन बना
1930 में पूर्ण स्वराज्य का संकल्प लेने वाली राजनीतिक चेतना आने वाले वर्षों में और मजबूत हुई।
1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ निर्णायक आंदोलन का प्रस्ताव स्वीकार किया और गांधी ने ‘करो या मरो’ का आह्वान किया। इसके बाद पूरे देश में आंदोलन फैल गया।
रोहतास क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। जिला संबंधी ऐतिहासिक विवरणों में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में यहां के स्वतंत्रता सेनानियों की अग्रणी भूमिका और कई क्रांतिकारियों की शहादत का उल्लेख मिलता है।
जिनके नाम इतिहास के बड़े पन्नों में कम दिखाई देते हैं
आज स्वतंत्रता आंदोलन की चर्चा होती है तो महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल और भगत सिंह जैसे बड़े नाम स्वाभाविक रूप से सामने आते हैं।
लेकिन आजादी की लड़ाई केवल इन प्रसिद्ध नेताओं की कहानी नहीं थी।
देश के छोटे-छोटे कस्बों और गांवों में ऐसे हजारों लोग थे, जिन्होंने आंदोलन को जमीन पर मजबूत किया। रोहतास की धरती भी ऐसे ही अनेक सेनानियों और आंदोलनकारियों की गवाह रही है।
स्थानीय इतिहास में निशान सिंह जैसे सेनानियों का उल्लेख इस बात की याद दिलाता है कि स्वतंत्रता की लड़ाई में इस क्षेत्र की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी।
26 जनवरी की कहानी इसलिए है खास
आज 26 जनवरी हमारे संविधान और गणतांत्रिक व्यवस्था का राष्ट्रीय पर्व है। लेकिन इसकी ऐतिहासिक यात्रा में एक ऐसा अध्याय भी है, जब इसी तारीख को भारतीयों ने अंग्रेजी शासन के बीच स्वतंत्र भारत का सपना सार्वजनिक रूप से व्यक्त किया था।
1930 का 26 जनवरी उस सपने और संकल्प का प्रतीक था।
रोहतास क्षेत्र में उस दिन हुए आयोजनों को इसी व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन की कड़ी के रूप में देखना चाहिए। यह वह दौर था जब लोगों ने यह संदेश दिया कि भारत को केवल सुधार नहीं, बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता चाहिए।
आज के रोहतास के लिए यह सिर्फ इतिहास नहीं, विरासत है
आज रोहतास में पीढ़ियां बदल चुकी हैं। सासाराम, डेहरी, बिक्रमगंज और नासरीगंज का सामाजिक और राजनीतिक जीवन भी काफी बदल चुका है। लेकिन लगभग एक सदी पहले इसी क्षेत्र में स्वतंत्रता की जो चेतना आकार ले रही थी, वह आज भी जिले की ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है।
स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष को याद करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि आजादी हमें आसानी से नहीं मिली थी। इसके पीछे वर्षों का आंदोलन, जेल, दमन, संघर्ष और असंख्य लोगों का त्याग था।
दैनिक भारतवर्ष का निष्कर्ष: 26 जनवरी की एक दूसरी कहानी
26 जनवरी की पहचान आज गणतंत्र दिवस के रूप में है, लेकिन इसकी कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
1930 में इसी तारीख को भारत ने पहली बार व्यापक रूप से पूर्ण स्वराज्य के संकल्प को सार्वजनिक रूप दिया था। रोहतास क्षेत्र में भी इस संकल्प की गूंज सुनाई दी थी।
यही वजह है कि जब आज हम 26 जनवरी का राष्ट्रीय पर्व मनाते हैं, तो हमें उस दौर को भी याद करना चाहिए जब इसी तारीख पर देश के लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत के सामने स्वतंत्र भारत का सपना रखने का साहस किया था।
दैनिक भारतवर्ष की जुबानी रोहतास की यह कहानी सिर्फ 1930 की कहानी नहीं है। यह उस लंबी यात्रा की कहानी है, जो 1857 के प्रतिरोध से होकर 1930 के पूर्ण स्वराज्य संकल्प और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक पहुंची और अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता में परिणत हुई।















