क्रीमी लेयर और ‘कोटे में कोटा’ की बहस से शुरू हुआ विवाद इस्तीफे की मांग तक पहुंचा, अब तेजस्वी यादव ने चिराग पासवान और जीतन राम मांझी को घेरा
न्यूज़ डेस्क : पटना | दैनिक भारतवर्ष
पटना: बिहार की राजनीति में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर बड़े सियासी विवाद का केंद्र बन गया है। अनुसूचित जाति आरक्षण में क्रीमी लेयर और उप-वर्गीकरण यानी ‘कोटे में कोटा’ को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के सहयोगी दलों के नेताओं के बीच मतभेद अब खुलकर सामने आ गए हैं। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान तथा हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख जीतन राम मांझी के खेमे के बीच बयानबाजी के बाद मामला इस्तीफे की मांग तक पहुंच चुका है।
इसी बीच बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए NDA नेताओं पर तीखा हमला बोला है। तेजस्वी ने कहा कि आरक्षण को खत्म करने की ताकत किसी में नहीं है और यदि किसी नेता को आरक्षण व्यवस्था से आपत्ति है तो उसे आरक्षित सीट से इस्तीफा देकर सामान्य सीट से चुनाव लड़ना चाहिए।
कैसे शुरू हुआ आरक्षण को लेकर विवाद?
दरअसल, बिहार में आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा, अनुसूचित जातियों के भीतर अधिक वंचित समुदायों को अलग लाभ देने तथा क्रीमी लेयर जैसे मुद्दों पर पिछले कुछ दिनों से NDA के सहयोगी नेताओं के बीच अलग-अलग राय सामने आ रही है।
जीतन राम मांझी और उनके बेटे एवं बिहार सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन की ओर से अनुसूचित जातियों के भीतर सबसे अधिक वंचित समुदायों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने के लिए उप-वर्गीकरण या ‘कोटे में कोटा’ की मांग उठाई गई है। संतोष सुमन ने इस बहस में मुसहर, भुइयां, नट और डोम जैसे समुदायों की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि अनुसूचित जातियों के भीतर भी कुछ वर्ग अपेक्षाकृत अधिक वंचित हैं।
दूसरी ओर, चिराग पासवान ने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा और उससे जुड़े कुछ प्रस्तावों पर आपत्ति जताई है। विवाद बढ़ने के बाद उन्होंने जीतन राम मांझी और संतोष सुमन के इस्तीफे की मांग तक कर दी।
मांझी खेमे का तर्क क्या है?
जीतन राम मांझी और संतोष सुमन का तर्क है कि आरक्षण का लाभ समाज के उन तबकों तक भी प्रभावी ढंग से पहुंचना चाहिए जो लंबे समय से सबसे अधिक वंचित रहे हैं।
संतोष सुमन ने स्पष्ट किया है कि ‘कोटे में कोटा’ और क्रीमी लेयर दो अलग-अलग विषय हैं। उनके मुताबिक, सबसे कमजोर और वंचित समुदायों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए उप-वर्गीकरण पर चर्चा जरूरी है।
मांझी खेमे की इसी मांग को लेकर चिराग पासवान के साथ मतभेद गहरा गया है।
चिराग पासवान ने मांगा इस्तीफा
विवाद उस समय और बढ़ गया जब चिराग पासवान ने जीतन राम मांझी और उनके बेटे संतोष सुमन के इस्तीफे की मांग कर दी। इसके जवाब में मांझी खेमे की ओर से भी पलटवार किया गया और चिराग से पहले स्वयं पद छोड़ने की बात कही गई।
इस घटनाक्रम ने NDA के भीतर सामाजिक न्याय और आरक्षण को लेकर सहयोगी दलों के अलग-अलग राजनीतिक रुख को सार्वजनिक कर दिया है।
अब तेजस्वी यादव की हुई एंट्री
विवाद में अब राजद के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव भी खुलकर सामने आ गए हैं।
30 अगस्त को पटना में पत्रकारों से बातचीत में तेजस्वी यादव ने आरक्षण को लेकर NDA के नेताओं पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि आरक्षण समाप्त करने वाला कोई पैदा नहीं हुआ है। साथ ही उन्होंने चिराग पासवान और जीतन राम मांझी को चुनौती देते हुए कहा कि यदि उन्हें आरक्षण से समस्या है तो वे आरक्षित सीट से इस्तीफा देकर सामान्य सीट से चुनाव लड़कर दिखाएं।
तेजस्वी ने इस पूरे विवाद को राजनीतिक रणनीति बताते हुए भाजपा और RSS पर भी आरोप लगाए। हालांकि ये आरोप तेजस्वी यादव के राजनीतिक बयान हैं और संबंधित पक्षों का अपना अलग दृष्टिकोण हो सकता है।
संजय झा ने भी दिया संकेत
इस बीच जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा की ओर से भी आरक्षण विवाद को लेकर सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी सामने आई। उन्होंने एक तस्वीर के माध्यम से जाति आधारित सामाजिक धारणाओं पर सवाल उठाने की कोशिश की। उनका संदेश इस विवाद में JDU के अलग राजनीतिक दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है।
चुनावी राजनीति के लिए क्यों अहम है यह विवाद?
बिहार में आरक्षण और सामाजिक न्याय का मुद्दा लंबे समय से चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। ऐसे समय में जब विभिन्न दल सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, NDA के भीतर ही आरक्षण के स्वरूप और उसके लाभ के बंटवारे को लेकर अलग-अलग राय सामने आना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
एक तरफ चिराग पासवान आरक्षण व्यवस्था में किसी भी ऐसी पहल के प्रति सतर्क नजर आ रहे हैं जिसे वे मौजूदा व्यवस्था को कमजोर करने वाला मानते हैं, वहीं मांझी खेमे की ओर से अधिक वंचित समुदायों के लिए उप-वर्गीकरण की मांग पर जोर दिया जा रहा है। इस मतभेद ने NDA के भीतर दलित राजनीति और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
आगे क्या?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि आरक्षण के इस विवाद को NDA नेतृत्व किस तरह संभालता है। क्या सहयोगी दलों के बीच बातचीत से मतभेद दूर होंगे या आने वाले दिनों में यह मुद्दा और राजनीतिक रूप लेगा, इस पर सबकी नजर रहेगी।
वहीं विपक्ष इस विवाद को NDA के भीतर मतभेद के तौर पर पेश कर रहा है। तेजस्वी यादव की ताजा टिप्पणी से साफ है कि राजद भी आरक्षण के मुद्दे को राजनीतिक रूप से जोरदार तरीके से उठाने की तैयारी में है।
दैनिक भारतवर्ष का निष्कर्ष: आरक्षण पर शुरू हुई यह बहस अब केवल नीति से जुड़ा मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि बिहार में गठबंधन की राजनीति, दलित प्रतिनिधित्व और सामाजिक समीकरणों से भी जुड़ती दिखाई दे रही है। हालांकि अंतिम नीति या किसी संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव के लिए संबंधित संस्थागत प्रक्रिया जरूरी होगी। फिलहाल नेताओं के बयान ही राजनीतिक बहस का केंद्र बने हुए हैं।















