JSSC-CGL और CDPO नियुक्तियों को रद्द करने के सरकारी आदेश पर झारखंड हाईकोर्ट की अंतरिम रोक के बाद छात्र संगठनों का विरोध तेज, 24 अगस्त से राज्यव्यापी ‘Recruitment System Reform Yatra’ का ऐलान
न्यूज़ डेस्क : रांची | दैनिक भारतवर्ष
झारखंड परीक्षा विवाद में नया मोड़, हाईकोर्ट की रोक के बाद फिर बढ़ा छात्र आक्रोश
रांची: झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं को लेकर चल रहा विवाद अब एक नए और महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है। राज्य सरकार द्वारा कथित अनियमितताओं के आधार पर कई भर्ती परीक्षाओं और नियुक्तियों को रद्द करने के फैसले के बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। अब झारखंड हाईकोर्ट ने JSSC-CGL और CDPO से जुड़ी नियुक्तियों को रद्द करने के सरकारी आदेश के अमल पर अंतरिम रोक लगा दी है। इससे पहले अदालत 11वीं और 13वीं JPSC परीक्षा तथा फूड सेफ्टी ऑफिसर नियुक्तियों से संबंधित रद्दीकरण पर भी रोक लगा चुकी है।
हाईकोर्ट के इन आदेशों के बाद उन अभ्यर्थियों और नियुक्त कर्मचारियों को तत्काल राहत मिली है, जिनकी नियुक्तियां सरकारी फैसले के बाद संकट में आ गई थीं। हालांकि, अदालत की रोक को मामले का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं, सरकारी जांच और प्रभावित अभ्यर्थियों के अधिकारों पर आगे न्यायिक सुनवाई जारी रहेगी।
22 भर्ती परीक्षाएं रद्द करने के फैसले से शुरू हुआ विवाद
झारखंड सरकार ने 18 अगस्त को भर्ती परीक्षाओं को लेकर बड़ा फैसला लेते हुए 22 परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रियाओं को रद्द करने की घोषणा की थी। इसके साथ ही छह अन्य परीक्षाओं को अगले आदेश तक रोकने तथा पुरानी 17 परीक्षाओं की जांच कराने का निर्णय सामने आया था। सरकार का कदम भर्ती प्रक्रियाओं में सामने आई कथित गड़बड़ियों और जांच एजेंसियों से प्राप्त तथ्यों के आधार पर बताया गया।
इस फैसले में JSSC-CGL और JPSC की कई महत्वपूर्ण परीक्षाएं भी प्रभावित हुईं। सरकार की कार्रवाई के बाद जहां परीक्षा में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ आंदोलन कर रहे अभ्यर्थियों के एक वर्ग ने इसे अपनी मांगों की दिशा में बड़ा कदम माना, वहीं चयनित और नियुक्त अभ्यर्थियों ने इसका विरोध शुरू कर दिया।
उनका तर्क है कि यदि भर्ती प्रक्रिया में किसी स्तर पर अनियमितता हुई भी है तो बिना व्यक्तिगत भूमिका तय किए सभी सफल अभ्यर्थियों की नियुक्तियां रद्द करना उचित नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने JSSC-CGL और CDPO नियुक्तियों पर लगाई रोक
21 अगस्त को झारखंड हाईकोर्ट ने JSSC-CGL से हुई नियुक्तियों और CDPO नियुक्तियों को रद्द करने वाली सरकारी अधिसूचनाओं के अमल पर अंतरिम रोक लगा दी। अदालत ने राज्य सरकार और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, मामले में अगली सुनवाई 15 सितंबर 2026 को निर्धारित है।
इससे पहले 20 अगस्त को अदालत ने 11वीं और 13वीं JPSC परीक्षाओं तथा फूड सेफ्टी ऑफिसर नियुक्तियों को रद्द करने के सरकारी फैसले पर भी अंतरिम रोक लगाई थी।
इसका सीधा अर्थ यह है कि सरकार के रद्दीकरण आदेशों पर फिलहाल न्यायिक परीक्षण जारी है और संबंधित नियुक्त अभ्यर्थियों को तत्काल तौर पर राहत मिली है। अंतिम स्थिति अदालत के आगे के आदेश और मामले की सुनवाई पर निर्भर करेगी।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद छात्र संगठनों में नाराजगी
दूसरी तरफ, परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन कर रहे छात्र संगठनों में हाईकोर्ट की रोक के बाद नाराजगी देखी गई। 22 अगस्त की रिपोर्टों के मुताबिक रांची में छात्रों का विरोध प्रदर्शन तेज हुआ और राज्य के कुछ अन्य हिस्सों में भी प्रदर्शन के दौरान तनाव की स्थिति बनी। रांची, गिरिडीह और हजारीबाग में छात्रों और झामुमो समर्थकों के बीच झड़प की खबरें सामने आई हैं।
छात्र पक्ष का आरोप है कि सरकार ने हाईकोर्ट में रद्दीकरण और जांच के अपने फैसले का पर्याप्त मजबूती से बचाव नहीं किया। हालांकि, ये आरोप आंदोलनकारी संगठनों के हैं और इनके संबंध में अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही निकाला जा सकता है।
24 अगस्त से राज्यव्यापी ‘Recruitment System Reform Yatra’
परीक्षा विवाद के बीच JPSC-JSSC अभ्यर्थी न्याय मंच से जुड़े छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने 24 अगस्त से राज्यव्यापी ‘Recruitment System Reform Yatra’ शुरू करने की घोषणा की है। रिपोर्ट के मुताबिक यह यात्रा नेमरा से शुरू होकर झारखंड के सभी 24 जिलों तक जाने की योजना है। मंच ने सरकार से भर्ती व्यवस्था में व्यापक सुधार की मांग की है।
छात्र संगठनों ने यह भी संकेत दिया है कि यदि सरकार भर्ती परीक्षा विवाद और जांच के मुद्दे पर उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप कदम नहीं उठाती है तो आंदोलन को फिर व्यापक रूप दिया जा सकता है।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
झारखंड सरकार के सामने इस समय दो महत्वपूर्ण चुनौतियां दिखाई दे रही हैं। पहली चुनौती भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष और विश्वसनीय जांच पूरी कराना है। दूसरी चुनौती उन अभ्यर्थियों और कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना है, जिन्होंने परीक्षा प्रक्रिया पूरी कर चयन हासिल किया और कई मामलों में सरकारी सेवा भी शुरू कर दी है।
सरकार ने जिन परीक्षाओं को रद्द किया, उनके पीछे जांच में सामने आई कथित गड़बड़ियों को आधार बनाया है। दूसरी ओर, प्रभावित अभ्यर्थियों का कहना है कि सामूहिक रूप से भर्ती रद्द करने के बजाय दोषी व्यक्तियों की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। यही विरोधाभास अब सड़क के आंदोलन से निकलकर अदालत की चौखट तक पहुंच चुका है।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल झारखंड परीक्षा विवाद का तत्काल केंद्र हाईकोर्ट की अगली सुनवाई है। अदालत सरकार और संबंधित पक्षों की दलीलों तथा दस्तावेजों पर विचार करेगी। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि रद्दीकरण के सरकारी आदेशों पर रोक आगे जारी रहती है या नहीं।
इस बीच, छात्रों का आंदोलन और प्रस्तावित राज्यव्यापी यात्रा यह संकेत दे रही है कि परीक्षा विवाद केवल कुछ परीक्षाओं के रद्द होने तक सीमित नहीं रह गया है। यह अब भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता, चयनित अभ्यर्थियों के अधिकार और राज्य की परीक्षा व्यवस्था में सुधार का व्यापक मुद्दा बन चुका है।
दैनिक भारतवर्ष का निष्पक्ष निष्कर्ष:
झारखंड में परीक्षा विवाद के दोनों पक्षों के अपने तर्क हैं। कथित अनियमितताओं की जांच और दोषियों पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन साथ ही उन अभ्यर्थियों के हितों पर भी विचार जरूरी है जिन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के तहत परीक्षा देकर सफलता हासिल की। फिलहाल हाईकोर्ट की अंतरिम रोक ने विवाद को एक नया कानूनी आयाम दिया है। इसलिए किसी भी पक्ष के पक्ष या विपक्ष में अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय न्यायिक प्रक्रिया और जांच के निष्कर्ष का इंतजार करना अधिक उचित होगा।
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