गोवा में कांग्रेस कार्यक्रम के दौरान दो अंतरे गाए जाने के बाद विवाद तेज, खड़गे ने ऐतिहासिक परंपरा का दिया हवाला; भाजपा ने उठाए सवाल
न्यूज़ डेस्क : दिल्ली | दैनिक भारतवर्ष
नई दिल्ली: देश की राजनीति में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर एक बार फिर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। 17 अगस्त को गोवा में कांग्रेस के एक कार्यक्रम के दौरान ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो अंतरे गाए जाने के बाद विवाद ने नया रूप ले लिया। कार्यक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी मौजूद थे। इसके बाद भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के रुख पर सवाल उठाए, जबकि खड़गे ने अपने पक्ष को स्पष्ट करते हुए कहा कि कांग्रेस जिस संस्करण को गाती है, वह महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं की परंपरा से जुड़ा रहा है।
दो अंतरे बनाम पूरा गीत, क्या है विवाद की वजह?
विवाद का केंद्र यह सवाल है कि सार्वजनिक और आधिकारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम्’ के कितने हिस्से का गायन किया जाना चाहिए। ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस के कई राष्ट्रीय आयोजनों में इसके शुरुआती दो अंतरे गाए जाते रहे हैं। राज्यसभा की आधिकारिक कार्यवाही में भी इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और 1937 में शुरुआती दो अंतरे अपनाए जाने से संबंधित बहस दर्ज है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने 2025-26 में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इसे राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत से जोड़ते हुए व्यापक कार्यक्रम आयोजित किए हैं। सरकार के अनुसार ‘वंदे मातरम्’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में लोगों को प्रेरित करने वाला महत्वपूर्ण राष्ट्रीय गीत रहा है।

खड़गे ने भाजपा पर साधा निशाना
विवाद के बीच मल्लिकार्जुन खड़गे ने भाजपा की आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस द्वारा गाया जाने वाला संस्करण कोई नया फैसला नहीं है। उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे नेताओं की परंपरा का हवाला देते हुए कांग्रेस के रुख का बचाव किया।
खड़गे ने इस मुद्दे को लेकर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान पर भी सवाल उठाए। उनके बयान के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।
भाजपा ने कांग्रेस पर साधा निशाना
भाजपा नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस को ‘वंदे मातरम्’ जैसे राष्ट्रीय महत्व के गीत के प्रति पूरा सम्मान दिखाना चाहिए। भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने भी कांग्रेस के कार्यक्रमों में गीत के केवल दो अंतरे गाए जाने को लेकर सवाल उठाए।
भाजपा की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय भावना से गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐसे में इसके गायन को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद स्वाभाविक रूप से व्यापक राजनीतिक बहस का रूप ले रहे हैं।
सरकार के लिए भी महत्वपूर्ण है ‘वंदे मातरम्’ का वर्ष
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब केंद्र सरकार ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर वर्षभर कार्यक्रम आयोजित कर रही है। स्वतंत्रता दिवस 2026 के आयोजनों में भी इसे विशेष महत्व दिया गया। संस्कृति मंत्रालय की ओर से 18 अगस्त को भी 150 वर्ष के उपलक्ष्य में कार्यक्रम आयोजित किए जाने की जानकारी दी गई है।
संसद के हाल में संपन्न मानसून सत्र के दौरान भी ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह अंतरों के गायन का उल्लेख सामने आया था। इसके बाद कांग्रेस के अलग-अलग कार्यक्रमों में गीत के शुरुआती दो अंतरों के गायन को लेकर राजनीतिक तुलना शुरू हो गई।
विवाद के बीच बड़ा सवाल—राष्ट्रगीत या राजनीतिक मुद्दा?
‘वंदे मातरम्’ पर ताजा विवाद अब केवल गीत के गायन तक सीमित नहीं रह गया है। भाजपा इसे राष्ट्रीय सम्मान और देशभक्ति से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस ऐतिहासिक परंपरा और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अपनाए गए संस्करण का हवाला दे रही है।
इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि ‘वंदे मातरम्’ भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में विशेष संवैधानिक-सांस्कृतिक महत्व रखता है। इसलिए इसके स्वरूप और सार्वजनिक गायन को लेकर होने वाली बहस का राजनीतिक रंग लेना देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को भी दर्शाता है।
आगे और बढ़ सकता है राजनीतिक टकराव
2026 में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के कार्यक्रमों के बीच यह विवाद अभी थमता दिखाई नहीं दे रहा है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही इस मुद्दे को अपने-अपने राजनीतिक और वैचारिक दृष्टिकोण से जनता के सामने रख रहे हैं।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक विरासत को लेकर राजनीतिक दलों की अलग-अलग व्याख्याएं एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बयानबाजी और तेज होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
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