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बिहार में अधिकारियों के लिए नया प्रोटोकॉल, सांसद-विधायकों के फोन मिस हुए तो तुरंत करना होगा कॉल बैक

न्यूज़ डेस्क : पटना | दैनिक भारतवर्ष

पटना: बिहार की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली बिहार सरकार ने अधिकारियों के लिए निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के साथ व्यवहार और संवाद को लेकर नया प्रोटोकॉल जारी किया है। अब सांसदों और विधायकों के फोन कॉल को प्राथमिकता देने तथा कॉल छूट जाने की स्थिति में तत्काल वापस फोन करने का निर्देश दिया गया है।

राज्य के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) की ओर से जारी निर्देश में अधिकारियों को सांसदों और विधायकों के पद की गरिमा और प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है। यह निर्देश ऐसे मामलों के सामने आने के बाद जारी किया गया है, जिनमें जनप्रतिनिधियों ने अधिकारियों के व्यवहार और प्रोटोकॉल के उल्लंघन की शिकायत की थी।

फोन मिस हुआ तो अधिकारी को करना होगा वापस कॉल

नए प्रोटोकॉल का सबसे अहम हिस्सा अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच फोन पर संवाद से संबंधित है। निर्देश के मुताबिक यदि किसी सांसद या विधायक का फोन अधिकारी से मिस हो जाता है तो काम से मुक्त होते ही अधिकारी को संबंधित जनप्रतिनिधि को वापस फोन करना होगा।

सरकार का उद्देश्य प्रशासन और निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना बताया गया है। इससे स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों की ओर से उठाए जाने वाले जनहित के मुद्दों पर प्रशासनिक प्रतिक्रिया तेज होने की उम्मीद की जा सकती है।

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बिहार अधिकारियों का नया प्रोटोकॉल (फोटो/दैनिक भारतवर्ष)

विधायकों के पत्र पर भी तय समय में जवाब

नए दिशा-निर्देश केवल फोन कॉल तक सीमित नहीं हैं। किसी विधायक की ओर से भेजे गए पत्र को प्राप्त करने के बाद अधिकारी को पहले उसकी प्राप्ति की जानकारी देनी होगी। इसके बाद निर्धारित समयसीमा के भीतर पत्र में उठाए गए मुद्दे पर की गई कार्रवाई और उसकी वर्तमान स्थिति की जानकारी भी देनी होगी।

इस व्यवस्था का सीधा संबंध जनप्रतिनिधियों द्वारा अपने क्षेत्रों की समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने की प्रक्रिया से है। पत्रों पर जवाबदेही तय होने से यह पता लगाना आसान होगा कि किसी शिकायत या मांग पर विभाग ने क्या कार्रवाई की।

अधिकारी के कार्यालय पहुंचने पर भी प्रोटोकॉल अनिवार्य

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई विधायक किसी अधिकारी के कार्यालय में किसी काम से पहुंचता है तो उसे उसके पद के अनुरूप आवश्यक सम्मान और प्रोटोकॉल दिया जाना चाहिए। इस संबंध में दिशा-निर्देश राज्य के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर पुलिस और जिला प्रशासन के अधिकारियों तक भेजे गए हैं।

बिहार की राजनीति में इसका क्या मतलब?

यह फैसला ऐसे समय आया है जब बिहार की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद नई राजनीतिक और प्रशासनिक शैली को लेकर चर्चा जारी है। अप्रैल 2026 में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भाजपा के सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद संभाला। वह बिहार के मुख्यमंत्री पद पर पहुंचने वाले भाजपा के पहले नेता बने।

इसके बाद अगस्त में पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की जीत ने भी बिहार की राजनीतिक चर्चा को नया आयाम दिया। किशोर ने भाजपा के लंबे समय से प्रभाव वाले क्षेत्र में जीत दर्ज की।

बांकीपुर परिणाम के बाद प्रशांत किशोर ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व पर सवाल उठाए, जबकि सरकार की ओर से विकास और प्रशासनिक सुधारों पर जोर दिया जा रहा है।

प्रशासन और राजनीति के बीच बेहतर तालमेल पर जोर

नए प्रोटोकॉल को केवल एक प्रशासनिक आदेश के तौर पर देखना या इसे बिहार की व्यापक राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़ना—दोनों ही दृष्टिकोण संभव हैं। हालांकि आदेश का प्रत्यक्ष उद्देश्य स्पष्ट है: सांसदों और विधायकों के साथ अधिकारियों के संवाद, पत्राचार और मुलाकातों में तय प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित करना।

अब इसकी वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जिलों और विभागों में इन निर्देशों को कितनी गंभीरता से लागू किया जाता है और जनप्रतिनिधियों की शिकायतों के निपटारे में इसका कितना व्यावहारिक असर दिखाई देता है।

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