‘इतिहास लेखन की भारतीय परम्परा’ पर दो दिनों तक हुआ अकादमिक मंथन, 16 तकनीकी सत्रों में 400 से अधिक शोध-पत्र प्रस्तुत
न्यूज़ डेस्क : रोहतास | दैनिक भारतवर्ष
सासाराम: गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय, जमुहार परिसर में आयोजित दशम युवा इतिहासकार राष्ट्रीय संगोष्ठी का रविवार को समापन हो गया। माधव संस्कृति न्यास, नई दिल्ली, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली तथा गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय, जमुहार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का मुख्य विषय ‘इतिहास लेखन की भारतीय परम्परा’ रहा।
संगोष्ठी में देश के 26 राज्यों से 416 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। दो दिनों के दौरान आयोजित 16 तकनीकी सत्रों में 400 से अधिक शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। देश के विभिन्न हिस्सों से इतिहासकारों, शोधार्थियों, शिक्षाविदों और विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी के कारण आयोजन स्थल पर विविध राज्यों की अकादमिक और सांस्कृतिक सहभागिता देखने को मिली। इसी व्यापक भागीदारी को आयोजकों ने सासाराम के ‘लघु भारत’ स्वरूप से जोड़ा।
भारतीय दृष्टि से इतिहास लेखन पर जोर
समापन सत्र की अध्यक्षता भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर अरविन्द जमखेडकर ने की। संगोष्ठी के समन्वयक डॉ. राम प्रकाश शर्मा ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए विषय की पृष्ठभूमि रखी, जबकि अतिथियों का परिचय डॉ. मुकेश कुमार ने कराया।
संगोष्ठी के दो दिवसीय आयोजन का प्रतिवेदन क्षेत्रीय संगठन मंत्री सुरेश पाण्डेय ने प्रस्तुत किया। उन्होंने आयोजन की गतिविधियों और शोध-पत्र प्रस्तुतियों का विवरण साझा किया।
समापन समारोह के मुख्य वक्ता एवं पूर्व कुलपति प्रोफेसर रजनीश शुक्ल ने बीज वक्तव्य में इतिहास लेखन में भारतीय दृष्टि को महत्व देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने भारतीय संदर्भों और दृष्टिकोणों के आधार पर इतिहास के अध्ययन एवं लेखन को आगे बढ़ाने का आग्रह किया।
वहीं, राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री संजय श्री हर्ष ने मार्गदर्शक वक्तव्य दिया। संगठन के महासचिव हेमंत धीग मजूमदार ने संगठन के उद्देश्यों और इतिहास लेखन से जुड़े उसके अकादमिक प्रयासों को रेखांकित किया।
16 तकनीकी सत्रों में हुआ शोध-पत्रों का प्रस्तुतीकरण
संगोष्ठी के दौरान आयोजित तकनीकी सत्रों में भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा, इतिहास के स्रोत, इतिहास-बोध, भारतीय इतिहास-दृष्टि और इतिहास लेखन से जुड़े विभिन्न विषयों पर शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए।
शोधार्थियों ने अपने शोध निष्कर्षों के माध्यम से इतिहास के अध्ययन, स्रोतों के उपयोग और भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास लेखन से जुड़े विभिन्न अकादमिक पहलुओं पर विचार रखे। आयोजकों के अनुसार, इन सत्रों का उद्देश्य इतिहास लेखन से जुड़े समकालीन अकादमिक विमर्श को व्यापक बनाना था।
कई विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधि और शिक्षाविद हुए शामिल
राष्ट्रीय संगोष्ठी में विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, बिहार सरकार के कई मंत्री, शिक्षा विभाग के प्रतिनिधि, प्रोफेसर, इतिहासकार और शोधार्थी शामिल हुए। केंद्रीय युवा इतिहासकार टोली, नई दिल्ली की ओर से डॉ. रत्नेश त्रिपाठी, डॉ. नरेंद्र शुक्ल, डॉ. निर्मल पाण्डेय और डॉ. प्रदीप उपाध्याय समेत विभिन्न राज्यों के युवा इतिहासकार प्रमुखों ने भी सहभागिता की।
आयोजन में देश के अलग-अलग राज्यों से आए प्रतिभागियों की मौजूदगी ने इसे राष्ट्रीय स्तर का अकादमिक मंच प्रदान किया।
आयोजन में इनकी रही प्रमुख भूमिका
संगोष्ठी के आयोजन में युवा इतिहासकार परिषद के राष्ट्रीय प्रमुख डॉ. विकास कुमार सिंह, समन्वयक डॉ. राम प्रकाश शर्मा और संयोजक डॉ. मुकेश कुमार की प्रमुख भूमिका रही।
आवास एवं सत्र संयोजन की जिम्मेदारी डॉ. विकास कुमार सिंह ने संभाली, जबकि यातायात समिति, मंच सज्जा और संचालन से जुड़ी व्यवस्थाओं का दायित्व डॉ. राम प्रकाश शर्मा ने संभाला।
स्मारिका के संपादन में इतिहास संकलन समिति, दक्षिण बिहार की ओर से राष्ट्रीय सचिव प्रोफेसर राजीव रंजन, प्रान्त अध्यक्ष डॉ. राजीव कुमार, प्रान्त महासचिव डॉ. शैलेश कुमार, प्रान्त कोषाध्यक्ष डॉ. सूर्यनारायण प्रसाद सहित अन्य सहयोगियों की भूमिका रही।
यातायात व्यवस्था में दीपक सिंह, सूरज सिंह, रोशन पाण्डेय और शिवम् पाटीदार ने सहयोग किया। मीडिया समिति में रोशन कुमार, प्रशांत कुमार और आकाश कुमार ने जिम्मेदारी संभाली। आवास व्यवस्था में अभिषेक सिंह, सत्यम सहित अन्य सहयोगियों ने योगदान दिया।
गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय की ओर से कृष्णा साहू, डॉ. मयंक राय, रवि रंजन, रोशन सिंह, पिंटू कुमार, संजय कुमार, अंकित कुमार और मनीष कुमार सहित अन्य लोगों ने आयोजन में सहयोग किया। पंजीकरण एवं किट वितरण में दिल्ली से डॉ. अस्मित शर्मा और राजीव मिश्र ने सहयोग किया।
राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय इतिहास-दृष्टि पर विमर्श
आयोजन की सफलता में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन मंत्री बाल मुकुंद पाण्डेय, गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय के कुलाधिपति गोपाल नारायण सिंह, गोविन्द नारायण सिंह और त्रिविक्रम नारायण सिंह की विशेष भूमिका बताई गई।
आयोजकों के अनुसार, संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय इतिहास लेखन की समृद्ध परंपरा, भारतीय इतिहास-दृष्टि और इतिहास लेखन की स्वदेशी पद्धतियों को लेकर व्यापक अकादमिक विमर्श को आगे बढ़ाना है। दो दिनों तक चले इस आयोजन में प्रस्तुत शोध-पत्रों और विभिन्न तकनीकी सत्रों के माध्यम से इतिहास लेखन के भारतीय दृष्टिकोण पर विचार-विमर्श को राष्ट्रीय मंच मिला।















