भारत-रूस संबंधों को नई दिशा देने पर जोर, 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य चर्चा के केंद्र में
न्यूज़ डेस्क : नई दिल्ली | दैनिक भारतवर्ष
राजधानी दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन से एक दिन पहले शुक्रवार, 11 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता हुई। दोनों नेताओं की यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है, जब वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया और यूक्रेन समेत कई भू-राजनीतिक संकटों के बीच भारत और रूस अपने रणनीतिक संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
बैठक में व्यापार, ऊर्जा, रक्षा, परमाणु सहयोग और महत्वपूर्ण खनिजों समेत कई रणनीतिक क्षेत्रों पर चर्चा प्रमुख रही। रिपोर्टों के मुताबिक भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार को वर्ष 2030 तक करीब 100 अरब डॉलर तक ले जाने की दिशा में भी बातचीत हुई। वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच व्यापार करीब 70 अरब डॉलर रहा था।
रूस से तेल खरीद भारत के लिए अहम
भारत-रूस संबंधों में ऊर्जा सहयोग की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। रूस भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। Reuters के अनुसार जुलाई 2026 में भारत के कच्चे तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी करीब 51 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। हालांकि अगस्त में रूस से भारत के तेल आयात में गिरावट दर्ज हुई।
मध्य पूर्व में जारी तनाव और समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम के बीच ऊर्जा सुरक्षा भारत के लिए विशेष महत्व रखती है। ऐसे में मोदी-पुतिन वार्ता में ऊर्जा सहयोग पर विशेष ध्यान दिया जाना स्वाभाविक है।
रक्षा क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण बातचीत
भारत और रूस के पारंपरिक रक्षा संबंध भी बैठक के प्रमुख मुद्दों में रहे। रिपोर्टों में रूस के Su-57 लड़ाकू विमान और रक्षा तकनीक से जुड़े संभावित सहयोग का उल्लेख किया गया है। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर इसे किसी अंतिम रक्षा सौदे के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। दोनों पक्षों के बीच रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा हुई है।
इसके अलावा नागरिक परमाणु ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, विनिर्माण, रेलवे और इस्पात क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के मुद्दे भी दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक एजेंडे का हिस्सा हैं।
यूक्रेन युद्ध पर भारत का रुख स्पष्ट
भारत लंबे समय से रूस-यूक्रेन संघर्ष के समाधान के लिए बातचीत और कूटनीति पर जोर देता रहा है। 31 अगस्त को किर्गिस्तान में SCO बैठक के दौरान मोदी और पुतिन की पिछली मुलाकात में भी प्रधानमंत्री ने युद्ध समाप्त करने और शांति के प्रयासों का समर्थन करने की बात कही थी।
नई दिल्ली की नीति रूस के साथ अपने पुराने रणनीतिक संबंधों को बनाए रखने के साथ-साथ पश्चिमी देशों के साथ संबंधों को भी आगे बढ़ाने की रही है। यही संतुलन इस समय भारत की विदेश नीति के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
BRICS सम्मेलन से पहले क्यों अहम है मोदी-पुतिन की मुलाकात?
भारत की मेजबानी में 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन आयोजित हो रहा है। इस सम्मेलन में रूस, चीन, ईरान समेत BRICS के अन्य सदस्य देशों के शीर्ष नेता शामिल हो रहे हैं। ऐसे में मोदी-पुतिन बैठक को केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे आगामी BRICS चर्चाओं की व्यापक भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
BRICS के विस्तार के बाद समूह की वैश्विक भूमिका और बढ़ी है। भारत के सामने एक ओर रूस और चीन के साथ संबंधों को संतुलित रखने की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को भी आगे बढ़ाना है। ऐसे में दिल्ली में हो रही यह बैठक भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
दैनिक भारतवर्ष की नजर में
मोदी-पुतिन वार्ता ऐसे समय हुई है जब वैश्विक राजनीति तेजी से बदल रही है। व्यापार और ऊर्जा से लेकर रक्षा एवं परमाणु सहयोग तक भारत-रूस संबंधों का दायरा व्यापक है। अब निगाहें BRICS शिखर सम्मेलन पर हैं, जहां भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं और वैश्विक दक्षिण से जुड़े मुद्दों पर महत्वपूर्ण चर्चा होने की उम्मीद है।

















