मितन्नी-हित्ती संधि में मित्र, वरुण, इंद्र और नासत्य से मिलते-जुलते नामों का उल्लेख; अमरना अभिलेखों से सामने आते हैं प्राचीन मिस्र और पश्चिम एशिया के राजनयिक संबंध, लेकिन मिस्र में संस्कृत के शिलालेख मिलने का दावा अब भी प्रमाणित नहीं
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प्राचीन सभ्यताओं के इतिहास में भारत और मिस्र का उल्लेख आते ही एक सवाल अक्सर उठता है—क्या हजारों साल पहले मिस्र में संस्कृत भाषा बोली जाती थी? क्या मिस्र के पिरामिडों, मंदिरों या प्राचीन अभिलेखों में संस्कृत के शब्द और वैदिक देवी-देवताओं के नाम मिले हैं? सोशल मीडिया पर इस विषय से जुड़े अनेक दावे दिखाई देते हैं। हालांकि, ऐतिहासिक तथ्यों, पुरातात्त्विक खोजों और भाषावैज्ञानिक शोध को अलग-अलग समझना जरूरी है।
उपलब्ध शोध में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। प्राचीन पश्चिम एशिया के मितन्नी राज्य और हित्ती साम्राज्य से संबंधित अभिलेखों में मित्र, वरुण, इंद्र और नासत्य जैसे वैदिक परंपरा से जुड़े देवताओं के नामों के भाषाई समान रूप दर्ज हैं। घोड़ों को प्रशिक्षित करने से संबंधित एक प्राचीन ग्रंथ में भी ऐसे शब्द मिले हैं, जिनकी तुलना संस्कृत के संख्यावाचक शब्दों से की जाती है।
इन प्रमाणों का ऐतिहासिक महत्त्व है। लेकिन इन्हें सीधे मिस्र में संस्कृत भाषा के व्यापक प्रचलन या मिस्र के पिरामिडों पर संस्कृत शिलालेख मिलने का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।
मितन्नी साम्राज्य क्या था और उसका इतिहास से क्या संबंध है?
मितन्नी कांस्य युग का एक महत्त्वपूर्ण राज्य था, जो लगभग दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में उत्तरी मेसोपोटामिया और उसके आसपास के क्षेत्रों में प्रभावशाली था। इसका प्रभाव आज के उत्तरी सीरिया और दक्षिण-पूर्वी तुर्किये के आसपास के क्षेत्रों तक फैला हुआ था।
उस समय पश्चिम एशिया में मिस्र, हित्ती, असीरिया और बेबीलोनिया जैसी शक्तियां सक्रिय थीं। इन राज्यों के बीच युद्ध, व्यापार, वैवाहिक संबंध और राजनयिक संवाद होते थे। मितन्नी के शासकों के मिस्र के फिरऔनों से भी संबंध थे।
मितन्नी के कुछ शासकों और राजपरिवार से संबंधित व्यक्तियों के नामों में इंडो-आर्य भाषाई समानताएं पहचानी गई हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ धार्मिक नाम और घोड़ों से संबंधित तकनीकी शब्द भी भाषाविदों के अध्ययन का विषय बने हैं।
इतालवी विद्वान सिमोन जेंटिले का 2019 में Onoma नामक शोध-पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन मितन्नी से संबंधित इंडो-ईरानी व्यक्तिगत नामों और उनके सांस्कृतिक संदर्भों का विश्लेषण करता है। यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि प्राचीन पश्चिम एशिया के अभिलेखों में ऐसे भाषाई तत्व मौजूद हैं, जिनका संबंध भारतीय वैदिक और व्यापक इंडो-ईरानी भाषाई परंपराओं से जोड़ा जाता है।
मितन्नी-हित्ती संधि में मिले वैदिक देवताओं से मिलते-जुलते नाम
इस विषय का सबसे उल्लेखनीय प्रमाण मितन्नी के राजा शत्तिवाजा और हित्ती शासक शुप्पिलुलियुमा प्रथम के बीच हुई संधि से जुड़ा है। यह संधि लगभग 14वीं शताब्दी ईसा पूर्व की मानी जाती है।
संधि में अनेक देवताओं को गवाह के रूप में आह्वान किया गया था। इनमें कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी तुलना भारतीय वैदिक परंपरा के देवताओं से की जाती है।
1. मित्र (Mitra): वैदिक परंपरा में मित्र का संबंध मैत्री, अनुबंध और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा है। मितन्नी-हित्ती संधि में दर्ज मित्र से मिलता-जुलता नाम इस भाषाई और धार्मिक संबंध के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण है।
2. वरुण (Varuna): ऋग्वेद में वरुण का उल्लेख प्रमुख देवता के रूप में मिलता है। संधि में दर्ज अरुणा या उरुवाना जैसे रूपों की तुलना वरुण नाम से की जाती है।
3. इंद्र (Indra): वैदिक साहित्य में इंद्र प्रमुख देवताओं में शामिल हैं। मितन्नी-हित्ती संधि में इंदर या इंद्र से मिलता-जुलता रूप दर्ज है, जिसे भाषाविद् वैदिक इंद्र से संबंधित मानते हैं।
4. नासत्य (Nasatya): नासत्य नाम अश्विन देवताओं से जुड़ी वैदिक परंपरा का हिस्सा है। संधि में दर्ज नाशत्तियन्ना जैसे रूप को नासत्य से संबंधित माना जाता है।
इन नामों का महत्त्व इसलिए है कि ये केवल अलग-अलग ध्वनियों की समानता तक सीमित नहीं हैं। विद्वान इनके ऐतिहासिक संदर्भ, लेखन-रूप और वैदिक साहित्य में समान नामों के क्रम का भी अध्ययन करते हैं।
फिर भी, इन नामों की उपस्थिति को किसी एक सभ्यता से दूसरी सभ्यता में संपूर्ण धार्मिक परंपरा के स्थानांतरण का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। इससे भाषाई और सांस्कृतिक संबंधों की संभावना मजबूत होती है, लेकिन संपर्क का पूरा मार्ग और उसका स्वरूप अलग शोध का विषय है।
घोड़ों को प्रशिक्षित करने वाले प्राचीन ग्रंथ में संस्कृत से समानता
मितन्नी से जुड़े इंडो-आर्य भाषाई तत्वों का दूसरा प्रमुख उदाहरण किक्कुलि के घोड़ा-प्रशिक्षण ग्रंथ में मिलता है। यह ग्रंथ हित्ती भाषा में लिखा गया था और इसमें घोड़ों को प्रशिक्षित करने तथा रथों के लिए तैयार करने की तकनीकों का वर्णन है।
इस ग्रंथ में कुछ संख्यावाचक और तकनीकी शब्द ऐसे हैं, जिनकी तुलना संस्कृत के शब्दों से की जाती है।
| प्राचीन ग्रंथ में दर्ज रूप | संस्कृत में समान रूप |
|---|---|
| aika | एक (eka) |
| tera | त्रि (tri) |
| panza | पञ्च (pañca) |
| satta | सप्त (sapta) |
| nawa | नव (nava) |
यह तुलना प्राचीन भाषाओं के अध्ययन में उपयोगी है। हालांकि, इन रूपों को आधुनिक संस्कृत के बिल्कुल समान शब्द समझना सही नहीं होगा। हजारों वर्षों में भाषाओं के उच्चारण, ध्वनियों और शब्द-रूपों में परिवर्तन होता है। इसलिए भाषाविद् इन शब्दों की तुलना ऐतिहासिक ध्वनि-परिवर्तनों और उनके संदर्भों के आधार पर करते हैं।
यह ग्रंथ इस बात का संकेत देता है कि प्राचीन पश्चिम एशिया में घोड़ों और रथों से जुड़ी कुछ तकनीकी परंपराओं में इंडो-आर्य भाषाई तत्व मौजूद थे। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हित्ती भाषा या मितन्नी की पूरी आबादी संस्कृत बोलती थी।
मिस्र के अमरना अभिलेखों में क्या मिला?
मिस्र के प्राचीन इतिहास से इस विषय का संबंध अमरना अभिलेखों के कारण जुड़ता है। अमरना प्राचीन मिस्र का एक महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल है, जहां से मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखे राजनयिक पत्र मिले हैं।
इन पत्रों में मिस्र के फिरऔनों और पश्चिम एशिया के विभिन्न शासकों के बीच संवाद दर्ज हैं। इनमें मितन्नी के राजा तुशरत्ता के पत्र भी शामिल हैं, जो मिस्र के फिरऔन अमेनहोटेप तृतीय और उनके राजपरिवार से संबंधित थे।
इन अभिलेखों से पता चलता है कि प्राचीन मिस्र और मितन्नी के बीच राजनीतिक संबंध, उपहारों का आदान-प्रदान और राजपरिवारों के वैवाहिक संबंध मौजूद थे।
यहां एक महत्त्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। अमरना अभिलेखों में राजनयिक संबंधों के प्रमाण मिलना और मिस्र में संस्कृत भाषा में लिखा हुआ कोई अभिलेख मिलना दो अलग बातें हैं।
अमरना के राजनयिक पत्रों की प्रमुख भाषा अक्कादी थी, जिसे उस समय पश्चिम एशिया में अंतरराष्ट्रीय राजनयिक संवाद के लिए व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता था। ये पत्र कीलाक्षर लिपि में लिखे गए थे। इनमें मितन्नी से संबंधित सामग्री का मिलना उस समय के राज्यों के बीच संपर्क का प्रमाण है, न कि मिस्र में संस्कृत के सामान्य उपयोग का।
क्या मिस्र में संस्कृत के शिलालेख मिले हैं?
इस प्रश्न का उत्तर सावधानी के साथ देना जरूरी है।
अब तक उपलब्ध विश्वसनीय अकादमिक साहित्य के आधार पर मिस्र के पिरामिडों, मंदिरों या अन्य स्मारकों पर संस्कृत में लिखे किसी ऐसे शिलालेख का प्रमाण स्थापित नहीं है, जिसे विद्वानों ने प्राचीन मिस्र में संस्कृत के व्यापक उपयोग का प्रमाण माना हो।
मितन्नी और हित्ती अभिलेखों में इंडो-आर्य भाषाई तत्वों का होना एक अलग और प्रमाणित ऐतिहासिक विषय है। लेकिन इसे मिस्र के स्मारकों पर संस्कृत लेख मिलने के दावे के समर्थन में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
यदि भविष्य में किसी कथित संस्कृत शिलालेख की चर्चा होती है, तो उसकी प्रामाणिकता जांचने के लिए कई प्रश्न जरूरी होंगे—वह वस्तु कहां मिली, उसकी पुरातात्त्विक तिथि क्या है, लेखन का स्वरूप क्या है, उसका भाषाई विश्लेषण किसने किया और क्या अन्य स्वतंत्र विशेषज्ञों ने उस निष्कर्ष की पुष्टि की है?
केवल कुछ चिह्नों या शब्दों का संस्कृत से मिलता-जुलता दिखाई देना किसी अभिलेख को प्राचीन संस्कृत का प्रमाण नहीं बना देता।
क्या इन प्रमाणों से भारत और मिस्र के प्राचीन संबंध सिद्ध होते हैं?
इन प्रमाणों से प्राचीन दुनिया में दूर-दराज के राज्यों के बीच संपर्कों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को समझने में सहायता मिलती है। मिस्र और मितन्नी के राजनयिक संबंध ऐतिहासिक रूप से दर्ज हैं। मितन्नी के कुछ नामों और धार्मिक शब्दों की वैदिक परंपरा से समानता भी भाषावैज्ञानिक शोध का विषय है।
लेकिन इन तथ्यों से भारत और मिस्र के बीच किसी विशेष प्रत्यक्ष यात्रा, बड़े पैमाने पर प्रवासन या एक सभ्यता द्वारा दूसरी सभ्यता के निर्माण को अपने आप सिद्ध नहीं किया जा सकता।
ऐसे निष्कर्षों के लिए अलग-अलग प्रकार के प्रमाणों की आवश्यकता होती है। इनमें पुरातात्त्विक अवशेष, दिनांकित अभिलेख, भाषाई विश्लेषण, व्यापारिक सामग्री और स्वतंत्र ऐतिहासिक स्रोत शामिल हो सकते हैं।
इतिहास में किसी समानता का अर्थ हमेशा प्रत्यक्ष संपर्क नहीं होता। कभी-कभी दो भाषाओं में समान शब्द साझा पूर्वज भाषा से विकसित हुए होते हैं, कभी किसी समुदाय के माध्यम से शब्द दूसरी भाषा तक पहुंचते हैं और कभी लंबे समय तक चले संपर्क से समानताएं बनती हैं। इसलिए प्रत्येक मामले की व्याख्या उसके संदर्भ में करना आवश्यक है।
इतिहास क्या कहता है और किन दावों से सावधान रहना चाहिए?
इस विषय पर उपलब्ध प्रमाणों से तीन प्रमुख बातें सामने आती हैं।
पहली, मितन्नी-हित्ती संधि में मित्र, वरुण, इंद्र और नासत्य से संबंधित माने जाने वाले नाम दर्ज हैं। दूसरी, किक्कुलि के घोड़ा-प्रशिक्षण ग्रंथ में कुछ ऐसे तकनीकी और संख्यावाचक शब्द हैं, जिनकी तुलना संस्कृत से की जाती है। तीसरी, मिस्र के अमरना अभिलेखागार में मितन्नी के शासकों से जुड़े राजनयिक पत्र प्राचीन मिस्र और पश्चिम एशिया के संबंधों की पुष्टि करते हैं।
लेकिन इन तथ्यों से यह दावा प्रमाणित नहीं होता कि मिस्र की सामान्य जनता संस्कृत बोलती थी या वहां के पिरामिड संस्कृत में लिखे गए ग्रंथों और शिलालेखों से भरे हुए थे।
किसी ऐतिहासिक विषय का महत्त्व बढ़ाने के लिए उसके प्रमाणों को बढ़ा-चढ़ाकर बताने की आवश्यकता नहीं है। वास्तविक अभिलेख अपने आप में महत्त्वपूर्ण हैं और उन्हें सही संदर्भ में समझना ही इतिहास के प्रति जिम्मेदार दृष्टिकोण है।
दैनिक भारतवर्ष का निष्कर्ष
प्राचीन मिस्र और भारतीय वैदिक परंपरा के बीच संभावित भाषाई तथा सांस्कृतिक संबंधों का विषय आज भी इतिहास और भाषाविज्ञान के अध्ययन के लिए दिलचस्प है। मितन्नी-हित्ती संधि में दर्ज वैदिक देवताओं से मिलते-जुलते नाम और किक्कुलि के ग्रंथ में मौजूद इंडो-आर्य भाषाई तत्व इस चर्चा के ठोस आधार हैं।
हालांकि, सबसे स्पष्ट प्रमाण मितन्नी और हित्ती अभिलेखों से संबंधित हैं। मिस्र के साथ उनका संबंध मुख्यतः उस समय के राजनयिक संपर्कों और अमरना अभिलेखों के माध्यम से सामने आता है।
इसलिए इस विषय पर सबसे तथ्यपरक निष्कर्ष यही है कि प्राचीन पश्चिम एशिया में वैदिक परंपरा से संबंधित भाषाई संकेत मौजूद थे और मिस्र के साथ वहां के राज्यों के संपर्क थे। लेकिन मिस्र में संस्कृत के व्यापक प्रचलन या पिरामिडों पर संस्कृत शिलालेख मिलने का दावा स्थापित ऐतिहासिक प्रमाणों से पुष्ट नहीं होता।
दैनिक भारतवर्ष की नजर में
इतिहास को समझने के लिए न तो प्रमाणों की अनदेखी करनी चाहिए और न ही अधूरे प्रमाणों से बड़े निष्कर्ष निकालने चाहिए। तथ्य जहां तक पहुंचाते हैं, निष्कर्ष भी वहीं तक सीमित रहने चाहिए।
“व्यूज़ नहीं, न्यूज़ की बात”



















