कठौतिया घाट के दरवाजे पर मिले क्षतिग्रस्त संस्कृत शिलालेख को वर्षों बाद पढ़ने में मिली सफलता; 1607 की किलेबंदी का मिला महत्वपूर्ण विवरण
न्यूज़ डेस्क : रोहतास | दैनिक भारतवर्ष
सासाराम: रोहतासगढ़ किले के इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। किले के कठौतिया घाट दरवाजे के ऊपर स्थित प्राचीन संस्कृत शिलालेख को इतिहासकार डॉ. श्याम सुंदर तिवारी ने वर्षों के प्रयास के बाद पढ़ने में सफलता हासिल की है। करीब 20 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह शिलालेख लंबे समय से क्षतिग्रस्त अवस्था में था और इसके अक्षरों को पढ़ना इतिहासकारों एवं पुरातत्व विशेषज्ञों के लिए चुनौती बना हुआ था।
आज 22 सितंबर 2026 को सामने आई जानकारी के अनुसार, शिलालेख से राजा मान सिंह द्वारा वर्ष 1607 में रोहतासगढ़ की किलेबंदी कराए जाने से संबंधित विवरण सामने आया है। यह खोज रोहतासगढ़ के सैन्य इतिहास और उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
दो सदियों से अधिक समय से पढ़े जाने का इंतजार
कठौतिया घाट के दरवाजे पर मौजूद शिलालेख का बड़ा हिस्सा समय के साथ क्षतिग्रस्त हो चुका है। इसके अक्षर भी काफी छोटे हैं। इसी वजह से लंबे समय तक इसका पूरा पाठ स्पष्ट नहीं हो सका।
रिपोर्ट के अनुसार, अंग्रेज सर्वेक्षक फ्रांसिस बुकानन ने वर्ष 1812 में अपनी डायरी में इस शिलालेख का उल्लेख किया था। इसके बाद 1838 में मार्टिन की रिपोर्ट, 1876 में इतिहासकार राजेंद्र लाल मित्र तथा 1896 में प्रो. किल्हॉर्न के शोध में भी इसका उल्लेख मिला, लेकिन शिलालेख का स्पष्ट मूल पाठ सामने नहीं आ सका।
वर्ष 1901-02 में एएसआई के डॉ. थियोडोर ब्लोच और 1929 में मौलवी मोहम्मद हामिद कुरैशी ने भी क्षेत्र का सर्वेक्षण किया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, शिलालेख की ऊंचाई, पहुंच की कठिनाई और उसके क्षतिग्रस्त होने के कारण वे भी इसे पूरी तरह पढ़ने में सफल नहीं हुए।
शिलालेख में क्या जानकारी सामने आई?
शिलालेख से प्राप्त जानकारी का संबंध रोहतासगढ़ की किलेबंदी और कठौतिया घाट के निर्माण से बताया गया है।
इतिहासकार डॉ. श्याम सुंदर तिवारी के अनुसार, रोहतासगढ़ तक पहुंचने वाले इस मार्ग का सामरिक महत्व था। कठौतिया घाट ऐसा मार्ग था, जहां से किले तक पहुंच अपेक्षाकृत आसान थी। इसलिए इस रास्ते की सुरक्षा के लिए किलेबंदी की गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, राजा मान सिंह ने यहां मिट्टी और पत्थरों से मजबूत संरचना तैयार कराई और प्रवेश मार्ग पर दरवाजा बनवाया। इसी दरवाजे के ऊपर संबंधित शिलालेख अंकित कराया गया।
1607 में राजा मान सिंह ने कराई थी किलेबंदी
शिलालेख के अध्ययन से सामने आई जानकारी में वर्ष 1607 विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इस समय रोहतासगढ़ की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए किलेबंदी से जुड़े निर्माण कार्य कराए जाने की जानकारी मिलती है।
रोहतासगढ़ की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए कठौतिया घाट जैसे प्रवेश मार्गों की सुरक्षा सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण रही होगी। शिलालेख इस निर्माण गतिविधि को ऐतिहासिक संदर्भ प्रदान करता है।
जहांगीर के शासनकाल में भी शिलालेख पर उनका नाम नहीं
इस शिलालेख से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण पहलू उस समय की राजनीतिक स्थिति से संबंधित है।
डॉ. तिवारी के अनुसार, वर्ष 1607 में मुगल सम्राट जहांगीर का शासनकाल था। इसके बावजूद इस शिलालेख में जहांगीर का नाम नहीं मिलता, जबकि राजा मान सिंह का नाम दर्ज है।
इसी कारण शिलालेख को उस दौर में रोहतास क्षेत्र की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को समझने के लिए उपयोगी ऐतिहासिक स्रोत माना जा सकता है। हालांकि, इस तथ्य की व्यापक ऐतिहासिक व्याख्या के लिए अन्य समकालीन स्रोतों से तुलना भी आवश्यक होगी।
पतझड़ की तस्वीर से मिली सफलता की राह
शिलालेख को पढ़ने में आधुनिक तकनीक और एक संयोग ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
डॉ. तिवारी लंबे समय से शिलालेख को पढ़ने का प्रयास कर रहे थे। घने जंगल और पेड़-पौधों की पत्तियों के कारण सामान्य मौसम में शिलालेख की स्पष्ट तस्वीर लेना मुश्किल था।
रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में पतझड़ के दौरान उन्हें शिलालेख की अपेक्षाकृत साफ तस्वीर मिली। इसके बाद अलग-अलग कोणों से ली गई तस्वीरों का डिजिटल अध्ययन किया गया। क्षतिग्रस्त अक्षरों की पहचान और व्याख्या के लिए अन्य विशेषज्ञों की भी मदद ली गई। इसके बाद शिलालेख के पाठ को समझने में सफलता मिली।
रोहतासगढ़ के इतिहास के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज?
रोहतासगढ़ किला बिहार के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों में शामिल है। बिहार पर्यटन विभाग के अनुसार, किला अपनी सामरिक स्थिति और ऐतिहासिक स्थापत्य के लिए जाना जाता है। किले के परिसर में विभिन्न कालखंडों से संबंधित ऐतिहासिक अभिलेख और संरचनाएं मौजूद हैं।
ऐसे में कठौतिया घाट के शिलालेख का पाठ सामने आना रोहतासगढ़ के इतिहास के एक ऐसे हिस्से को समझने में मदद कर सकता है, जिसके बारे में लंबे समय से जानकारी अधूरी थी।
विशेष रूप से वर्ष 1607 की किलेबंदी, राजा मान सिंह का उल्लेख और जहांगीर के नाम का अभाव इतिहासकारों के लिए आगे के अध्ययन का आधार बन सकता है।
अभी आगे के अध्ययन की जरूरत
शिलालेख को पढ़े जाने के बाद सामने आए विवरण रोहतासगढ़ के इतिहास से जुड़े शोध को नई दिशा दे सकते हैं। हालांकि किसी ऐतिहासिक निष्कर्ष को अंतिम रूप देने के लिए शिलालेख के पाठ की विशेषज्ञों द्वारा विस्तृत समीक्षा और समकालीन ऐतिहासिक स्रोतों से उसका मिलान महत्वपूर्ण होगा।
इसलिए फिलहाल इसे रोहतासगढ़ के इतिहास से जुड़ी एक महत्वपूर्ण नई जानकारी के रूप में देखा जाना अधिक उचित है।
दैनिक भारतवर्ष की नजर में
रोहतासगढ़ के कठौतिया घाट स्थित प्राचीन संस्कृत शिलालेख का पाठ पढ़े जाने से रोहतास के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कड़ी सामने आई है। वर्ष 1607 की किलेबंदी और राजा मान सिंह से जुड़ी जानकारी न केवल स्थानीय इतिहास के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि उस समय की राजनीतिक और सैन्य व्यवस्था को समझने के लिए भी उपयोगी हो सकती है।
करीब दो सदियों से अधिक समय तक इतिहासकारों की नजर में मौजूद रहने के बावजूद अस्पष्ट रहे इस शिलालेख को डिजिटल तस्वीरों और विशेषज्ञ अध्ययन की मदद से पढ़ पाना अपने आप में रोहतासगढ़ के इतिहास और पुरातत्व से जुड़ी उल्लेखनीय उपलब्धि है।
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