भारत की मेजबानी में BRICS सम्मेलन बना वैश्विक कूटनीति का केंद्र, नई दिल्ली घोषणा में आतंकवाद और पश्चिम एशिया संकट पर साझा रुख
न्यूज़ डेस्क : नई दिल्ली | दैनिक भारतवर्ष
भारत की मेजबानी में नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन ने वैश्विक कूटनीति में भारत की भूमिका को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों ने नई दिल्ली घोषणा को स्वीकार किया, जिसमें आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख, अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को लेकर चिंता व्यक्त की गई है।
मोदी-शी मुलाकात पर दुनिया की नजर
BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई मुलाकात भी चर्चा का प्रमुख विषय रही। यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के बाद संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की कोशिश जारी है।
दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने, व्यापार एवं संपर्क बढ़ाने और मतभेदों को संवाद के माध्यम से सुलझाने पर जोर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता भारत-चीन संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण आधार है।
शी जिनपिंग की भारत यात्रा भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रिपोर्टों के अनुसार, यह 2019 के बाद उनकी पहली भारत यात्रा है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के रिश्तों में पैदा हुए तनाव के बीच यह बैठक संबंधों में संभावित सुधार का संकेत दे रही है, हालांकि सीमा विवाद और व्यापार असंतुलन जैसे मुद्दे अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।
BRICS घोषणा में आतंकवाद पर स्पष्ट संदेश
BRICS देशों ने नई दिल्ली घोषणा में आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा करते हुए इसे किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराए जाने की बात कही। घोषणा में आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग मजबूत करने और आतंकवाद के वित्तपोषण पर रोक लगाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
भारत के लिए यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नई दिल्ली लंबे समय से आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक स्तर पर स्पष्ट और सामूहिक कार्रवाई की मांग करता रहा है।
पश्चिम एशिया के संघर्ष पर भी चिंता
BRICS नेताओं ने पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और हिंसा पर गंभीर चिंता जताई। संयुक्त घोषणा में अधिकतम संयम बरतने तथा विवादों का समाधान बातचीत, कूटनीति और बहुपक्षीय प्रयासों के माध्यम से करने की अपील की गई है।
ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे अलग-अलग हितों वाले देशों का एक ही साझा बयान पर सहमत होना सम्मेलन की कूटनीतिक उपलब्धियों में गिना जा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों के स्तर पर यह सवाल भी बना हुआ है कि BRICS के भीतर मौजूद अलग-अलग रणनीतिक हित भविष्य में कितनी मजबूती से साझा नीतियों में बदल पाएंगे।
चीन को अगली BRICS अध्यक्षता
सम्मेलन के दौरान चीन को अगली BRICS अध्यक्षता मिलने की दिशा भी स्पष्ट हुई। शी जिनपिंग ने अगले वर्ष BRICS की अध्यक्षता करने और 19वें शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने की बात कही।
BRICS के विस्तार के बाद संगठन में अब ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका के साथ मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। यह समूह वैश्विक आबादी के 40 प्रतिशत से अधिक हिस्से और विश्व अर्थव्यवस्था के लगभग एक चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह सम्मेलन?
भारत की अध्यक्षता में हुए इस सम्मेलन को सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय बैठक के रूप में नहीं देखा जा रहा है। इसके जरिए भारत ने वैश्विक दक्षिण की आवाज, बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार, आतंकवाद के खिलाफ सहयोग, व्यापार और आर्थिक सहयोग तथा वैश्विक संकटों के कूटनीतिक समाधान जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी है।
विशेष रूप से मोदी-शी मुलाकात ने भारत-चीन संबंधों को लेकर नई चर्चा शुरू की है। हालांकि इसे दोनों देशों के बीच सभी विवादों का समाधान मानना जल्दबाजी होगी। सीमा, व्यापार घाटा और रणनीतिक अविश्वास जैसे मुद्दे अभी भी चुनौती बने हुए हैं।
दैनिक भारतवर्ष की नजर में
नई दिल्ली BRICS सम्मेलन से भारत को एक साथ कई मोर्चों पर कूटनीतिक महत्व मिला है। एक ओर BRICS ने आतंकवाद और पश्चिम एशिया संकट पर साझा संदेश दिया, वहीं मोदी-शी मुलाकात ने भारत-चीन संबंधों में संवाद की संभावनाओं को फिर चर्चा में ला दिया है। आने वाले समय में इन बैठकों के फैसले वास्तविक आर्थिक, सुरक्षा और कूटनीतिक सहयोग में कितने बदलते हैं, यही इस सम्मेलन की वास्तविक सफलता तय करेगा।
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