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शारदीय नवरात्र 2026 में मां दुर्गा के नौ स्वरूप और संपूर्ण पूजा विधि

शारदीय नवरात्र आज से शुरू: संकल्प से विसर्जन तक संपूर्ण दुर्गा पूजा विधि, संस्कृत मंत्रों सहित; जानें नौ देवियों की आराधना का पूरा विधान

नवरात्र में घटस्थापना, गणेश पूजन, देवी आवाहन, नौ स्वरूपों के मंत्र, भोग, आरती, हवन, कन्या पूजन और समापन की विस्तृत विधि; व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए जरूरी नियम भी जानें

पटना/बिहार | धर्म-अध्यात्म | दैनिक भारतवर्ष

शक्ति की उपासना का पावन पर्व शारदीय नवरात्र शुरू हो चुका है। इन नौ दिनों में श्रद्धालु मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना करते हैं। घरों और मंदिरों में घटस्थापना, दुर्गा सप्तशती का पाठ, मंत्र-जप, आरती, उपवास और कन्या पूजन जैसी धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं।

नवरात्र का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित है। इस दिन कलश स्थापना के साथ पूजा का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद मां ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की आराधना की जाती है।

लेकिन पूजा के दौरान अक्सर श्रद्धालुओं के मन में सवाल रहता है कि संकल्प कैसे लें, कौन-सा मंत्र बोलें, कलश कैसे स्थापित करें, नौ दिनों में किस देवी की पूजा किस विधि से करें और अंत में हवन, कन्या पूजन तथा विसर्जन कैसे संपन्न करें।

इन्हीं सवालों के जवाब के लिए यहां शारदीय नवरात्र 2026 की संपूर्ण पूजा-विधि संस्कृत मंत्रों सहित दी जा रही है। यह घर पर की जाने वाली सामान्य पूजा की विस्तृत मार्गदर्शिका है। विशेष वैदिक अनुष्ठानों, दुर्गा सप्तशती के पूर्ण पाठ और विस्तृत हवन के लिए अपनी परंपरा के अनुसार योग्य पुरोहित का मार्गदर्शन लेना उचित है।

शारदीय नवरात्र 2026 की प्रमुख तिथियां

इस वर्ष नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर से हुई है और 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। तिथियों के विशेष क्रम के कारण कुछ पूजा-अनुष्ठान एक ही कैलेंडर दिन पर पड़ सकते हैं।

तारीख तिथि या प्रमुख अवसर
11 अक्टूबर, रविवार प्रतिपदा, घटस्थापना और मां शैलपुत्री की पूजा
12 अक्टूबर, सोमवार द्वितीया और मां ब्रह्मचारिणी की पूजा
13 अक्टूबर, मंगलवार तृतीया और मां चंद्रघंटा की पूजा
14 अक्टूबर, बुधवार चतुर्थी और मां कूष्मांडा की पूजा
15 अक्टूबर, गुरुवार पंचमी और मां स्कंदमाता की पूजा
16 अक्टूबर, शुक्रवार षष्ठी और मां कात्यायनी की पूजा
17 अक्टूबर, शनिवार सप्तमी तिथि का आरंभिक पूजा-क्रम और मां कालरात्रि की आराधना
18 अक्टूबर, रविवार सप्तमी; स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा-क्रम
19 अक्टूबर, सोमवार अष्टमी, मां महागौरी की पूजा तथा महानवमी से जुड़े अनुष्ठान
20 अक्टूबर, मंगलवार विजयादशमी, नवमी हवन, पारण या विसर्जन की परंपराएं स्थानीय पंचांग के अनुसार

विशेष सूचना: नवरात्र के नौ स्वरूपों की पूजा का क्रम धार्मिक परंपरा पर आधारित है, जबकि अष्टमी, नवमी, संधि पूजा, हवन और पारण का समय स्थानीय पंचांग से निर्धारित किया जाना चाहिए। ऊपर दिया गया कैलेंडर सामान्य जानकारी के लिए है; पूजा का अंतिम मुहूर्त अपने नगर के पंचांग से सुनिश्चित करें।

1. पूजा से पहले आवश्यक सामग्री

नवरात्र की पूजा शुरू करने से पहले आवश्यक सामग्री एक स्थान पर रख लें। इससे पूजा के बीच में बार-बार उठने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

पूजा सामग्री की सूची

  • मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर
  • पूजा की चौकी और स्वच्छ लाल या पीला वस्त्र
  • कलश, स्वच्छ जल, नारियल और आम या अशोक के पत्ते
  • जौ बोने के लिए मिट्टी और पात्र, यदि यह परंपरा निभानी हो
  • रोली, कुमकुम, हल्दी, अक्षत और मौली
  • पुष्प, फूलों की माला और उपलब्ध पूजन सामग्री
  • धूप, दीपक, घी या तेल और रुई की बत्ती
  • फल, मिठाई, नैवेद्य और प्रसाद
  • पूजा की थाली, घंटी, आसन और स्वच्छ पात्र
  • दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती या देवी स्तुति की पुस्तक
  • हवन की परंपरा हो तो हवन कुंड, समिधा और निर्धारित हवन सामग्री

सभी वस्तुएं उपलब्ध होना अनिवार्य नहीं है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा कर सकते हैं।

2. स्नान, शुद्धिकरण और पूजा स्थल की तैयारी

सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थल को साफ करें और मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर को चौकी पर स्थापित करें।

पूजा आरंभ करने से पहले आसन पर बैठकर भगवान का स्मरण करें। हाथ में थोड़ा जल लेकर शुद्धिकरण मंत्र पढ़ें।

शुद्धिकरण मंत्र

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।

यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

इसके बाद पूजा स्थल और पूजन सामग्री पर थोड़ा जल छिड़कें। शांत मन से बैठकर भगवान गणेश और मां दुर्गा का स्मरण करें।

आचमन की विधि

परंपरागत आचमन में भगवान विष्णु के नामों का स्मरण किया जाता है। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार तीन बार थोड़ा जल ग्रहण करें।

ॐ केशवाय स्वाहा।

ॐ नारायणाय स्वाहा।

ॐ माधवाय स्वाहा॥

इसके बाद हाथ धोकर

ॐ हृषिकेषाय नमः।। बोलकर बोलकर भगवान का स्मरण करें।

आचमन की विस्तृत वैदिक विधि अलग हो सकती है। यदि आप किसी विशेष संप्रदाय की पूजा-विधि अपनाते हैं, तो उसी के अनुसार आचमन करें।

3. संकल्प कैसे लें? जानें संस्कृत संकल्प मंत्र

संकल्प का अर्थ है पूजा का उद्देश्य निश्चित करना। इसमें श्रद्धालु मां दुर्गा की आराधना का निश्चय करते हैं और अपने परिवार की सुख-शांति तथा कल्याण की कामना करते हैं।

संकल्प लेने की विधि

  1. पूजा आसन पर बैठें और मां दुर्गा का ध्यान करें।
  2. दाहिने हाथ में थोड़ा जल, पुष्प और अक्षत लें।
  3. अपना नाम, गोत्र, स्थान, तिथि और पूजा का उद्देश्य मन में रखें।
  4. नीचे दिया गया सामान्य संकल्प बोलें।
  5. अंत में हाथ में लिया हुआ जल पूजा पात्र में छोड़ दें।

दाहिने हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर अपना नाम, गोत्र, स्थान और पूजा का उद्देश्य मन में रखें। नौ दिनों का व्रत करने वाले अपने संकल्प में नौ दिन की पूजा का उल्लेख कर सकते हैं।

सामान्य संस्कृत संकल्प

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः।

श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्यैतस्य ब्रह्मणोह्नि द्वितीये परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भूर्लोके भारतवर्षे जम्बूद्विपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तस्य भारत क्षेत्रे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र मण्डलान्तरगते नई दिल्ली नाम्निनगरे (ग्रामे वा) श्रीगड़्गायाः ………… (उत्तरे/दक्षिणे) दिग्भागे देवब्राह्मणानां सन्निधौ श्रीमन्नृपतिवीरविक्रमादित्यसमयतः ………… संख्या-परिमिते प्रवर्त्तमानसंवत्सरे प्रभवादिषष्ठि-संवत्सराणां मध्ये सिद्धार्थी नामसंवत्सरे, दक्षिणायण अयने, शरद ऋतौ, आश्विन मासे, शुक्ल पक्ष पक्षे, प्रतिपदा तिथौ, रविवार वासरे, चित्रा नक्षत्रे, वैधृति योगे, बव करणे, तुला राशिस्थिते चन्द्रे, कन्या राशिस्थितेश्रीसूर्ये, कर्क राशिस्थिते देवगुरौ शेषेशु ग्रहेषु यथायथा राशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ………… गोत्रोत्पन्नस्य ………… शर्मणः (वर्मणः, गुप्तस्य वा) सपरिवारस्य ममात्मनः अहं ………… श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त-पुण्य-फलप्राप्त्यर्थं मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य क्षेमस्थैर्यायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्ध्यर्थमाधिभौतिकाधि-दैविकाध्यात्मिकत्रिविधतापशमनार्थं धर्मार्थकाममोक्षफलप्राप्त्यर्थं नित्यकल्याणलाभाय, श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थं, सकलकुटुम्बस्य सुखशान्तिस्वास्थ्यसमृद्ध्यर्थं, शारदीयनवरात्रपूजनं करिष्ये॥

इसके बाद हाथ में लिया जल पूजा पात्र में छोड़ दें।

सरल हिंदी भावार्थ: मैं अपने परिवार के कल्याण, सुख, शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना से मां दुर्गा की नवरात्र पूजा का संकल्प लेता/लेती हूं।

ध्यान दें: यह एक सामान्य संकल्प-प्रारूप है। कोष्ठक में दी गई जानकारी को वास्तविक पंचांग और अपनी परिस्थिति के अनुसार भरें। कोष्ठक में अपना नाम, स्थान, तिथि और अन्य विवरण भरें। पारंपरिक वैदिक संकल्प में देश, काल, संवत्सर, मास, पक्ष, तिथि, गोत्र और पूजा के उद्देश्य का विस्तृत उल्लेख हो सकता है। शुद्ध पंचांग-आधारित संकल्प के लिए पुरोहित से पुष्टि करें।

4. भगवान गणेश का पूजन

देवी पूजा से पहले भगवान गणेश का स्मरण करना अनेक हिंदू परंपराओं में प्रचलित है।

गणेश मंत्र

ॐ गं गणपतये नमः॥

प्रार्थना मंत्र

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

भगवान गणेश को पुष्प, अक्षत और उपलब्ध पूजन सामग्री अर्पित करें। इसके बाद मां दुर्गा की पूजा निर्विघ्न संपन्न होने की प्रार्थना करें।

5. घटस्थापना और कलश स्थापना की संपूर्ण विधि

नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना प्रमुख अनुष्ठान है। इसे स्थानीय पंचांग में दिए गए शुभ मुहूर्त में करना चाहिए।

कलश स्थापना के चरण

  1. चौकी पर स्वच्छ कपड़ा बिछाएं।
  2. जौ बोने की परंपरा हो तो मिट्टी के पात्र में मिट्टी भरकर जौ बोएं।
  3. कलश को साफ करके उसमें स्वच्छ जल भरें।
  4. अपनी परंपरा के अनुसार कलश में अक्षत, सुपारी और अन्य पूजन सामग्री डालें।
  5. कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते रखें और नारियल स्थापित करें।
  6. कलश पर रोली से तिलक लगाएं तथा मौली बांधें।
  7. कलश को जौ वाले पात्र या निर्धारित स्थान पर स्थापित करें।
  8. मां दुर्गा का ध्यान करके कलश की पूजा करें।

पवित्र नदियों के आवाहन का मंत्र

गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।

नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥

इसके बाद कलश पर रोली और अक्षत अर्पित करके प्रणाम करें।

कलश स्थापना के बाद प्रार्थना

ॐ कलशाय नमः॥

ॐ वरुणाय नमः॥

इन मंत्रों का उच्चारण करते हुए कलश का पूजन करें। विस्तृत कलश-पूजन में विभिन्न देवताओं का आवाहन अलग-अलग परंपराओं के अनुसार किया जाता है।

अखंड ज्योति की व्यवस्था

अखंड ज्योति जलाने की परंपरा हो तो दीपक को सुरक्षित स्थान पर रखें। उसे ज्वलनशील वस्तुओं, पर्दों और बच्चों की पहुंच से दूर रखें। पर्याप्त वायु-संचार तथा आग से सुरक्षा का ध्यान रखना जरूरी है। अखंड ज्योति रखना सभी श्रद्धालुओं के लिए अनिवार्य नहीं है।

6. मां दुर्गा का आवाहन और सामान्य पूजन

कलश स्थापना के बाद मां दुर्गा का ध्यान करें। प्रतिमा या तस्वीर के सामने पुष्प, अक्षत और दीप अर्पित करें।

देवी ध्यान मंत्र

ॐ जटा-जूट-समायुक्तामर्धेन्दुकृतशेखराम्।

लोचनत्रयसंयुक्तां पूर्णेन्दुसदृशाननाम्॥

देवी का सामान्य मंत्र

ॐ दुं दुर्गायै नमः॥

इसके बाद हाथ जोड़कर कहें:

आगच्छ त्वं महादेवि सर्वकल्याणकारिणि।

पूजां गृहाण देवेशि भक्तिं मे ह्यचलां कुरु॥

यह एक सामान्य प्रार्थना-रूप है; देवी आवाहन के शास्त्रीय मंत्र परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं।

देवी प्रार्थना

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

इसके बाद मां को आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किए जा सकते हैं। घर की सामान्य पूजा में उपलब्ध सामग्री के अनुसार इन उपचारों को सरल रखा जा सकता है।

सामान्य षोडशोपचार पूजा में देवी को आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और अन्य उपचार अर्पित किए जाते हैं। घर पर सरल पूजा में उपलब्ध सामग्री के अनुसार इन उपचारों को सरल रखा जा सकता है।

पूजा का चरण मंत्र
आसन ॐ दुर्गायै नमः। आसनं समर्पयामि॥
पाद्य ॐ दुर्गायै नमः। पाद्यं समर्पयामि॥
अर्घ्य ॐ दुर्गायै नमः। अर्घ्यं समर्पयामि॥
आचमन ॐ दुर्गायै नमः। आचमनीयं समर्पयामि॥
स्नान ॐ दुर्गायै नमः। स्नानीयं समर्पयामि॥
वस्त्र ॐ दुर्गायै नमः। वस्त्रं समर्पयामि॥
गंध ॐ दुर्गायै नमः। गन्धं समर्पयामि॥
पुष्प ॐ दुर्गायै नमः। पुष्पाणि समर्पयामि॥
धूप ॐ दुर्गायै नमः। धूपमाघ्रापयामि॥
दीप ॐ दुर्गायै नमः। दीपं दर्शयामि॥
नैवेद्य ॐ दुर्गायै नमः। नैवेद्यं निवेदयामि॥
प्रणाम ॐ दुर्गायै नमः। नमस्कारान् समर्पयामि॥

यदि प्रतिमा को स्नान कराने की परंपरा नहीं है तो तस्वीर के सामने प्रतीकात्मक रूप से जल अर्पित किया जा सकता है। इनमें से प्रत्येक उपचार अर्पित करते समय संबंधित मंत्र बोलें। सभी उपचार उपलब्ध होना आवश्यक नहीं है।

7. नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा

नवरात्र में नौ देवियों की आराधना का क्रम इस प्रकार है। प्रत्येक दिन सामान्य पूजा के बाद उस दिन की देवी का ध्यान, नाम-मंत्र, पुष्प अर्पण, नैवेद्य और आरती करें।

पहला दिन: मां शैलपुत्री

मां शैलपुत्री नवदुर्गा का पहला स्वरूप हैं। उन्हें शक्ति, स्थिरता और प्रकृति से जोड़कर पूजा जाता है।

मंत्र

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥

ध्यान श्लोक

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

पूजा विधि: मां को पुष्प, अक्षत और फल अर्पित करें। धूप-दीप जलाकर मंत्र-जप करें और आरती करें।

भोग: कई परंपराओं में घी का भोग अर्पित किया जाता है।

प्रार्थना: मां से धैर्य, साहस और स्थिरता की कामना करें।

दूसरा दिन: मां ब्रह्मचारिणी

मां ब्रह्मचारिणी तपस्या, संयम और दृढ़ संकल्प की प्रतीक मानी जाती हैं।

मंत्र

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥

ध्यान श्लोक

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।

देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

पूजा विधि: मां को पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। मंत्र-जप के बाद आरती करें।

भोग: चीनी, मिश्री या फल कई परंपराओं में चढ़ाए जाते हैं।

प्रार्थना: मां से संयम, साधना और कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने की शक्ति मांगें।

तीसरा दिन: मां चंद्रघंटा

मां चंद्रघंटा साहस, पराक्रम और निर्भयता का प्रतीक मानी जाती हैं।

मंत्र

ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥

ध्यान श्लोक

पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।

प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

पूजा विधि: मां का ध्यान करके पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। आरती करके शांति और साहस की प्रार्थना करें।

भोग: दूध या दूध से बनी मिठाई कुछ परंपराओं में अर्पित की जाती है।

चौथा दिन: मां कूष्मांडा

मां कूष्मांडा को सृष्टि की रचनात्मक ऊर्जा और प्रकाश से संबंधित देवी माना जाता है।

मंत्र

ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥

ध्यान श्लोक

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥

पूजा विधि: मां को पुष्प, अक्षत, फल और मिठाई अर्पित करें। मंत्र-जप और आरती के बाद स्वास्थ्य तथा सकारात्मकता की प्रार्थना करें।

भोग: मालपुआ या अन्य मिठाई कुछ परंपराओं में चढ़ाई जाती है।

पांचवां दिन: मां स्कंदमाता

मां स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय की माता हैं। उनका स्वरूप मातृत्व, करुणा और वात्सल्य का प्रतीक है।

मंत्र

ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥

ध्यान श्लोक

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।

शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

पूजा विधि: मां का ध्यान करें, पुष्प और अक्षत अर्पित करें तथा धूप-दीप जलाकर आरती करें।

भोग: केला और अन्य फल कई परिवारों में अर्पित किए जाते हैं।

प्रार्थना: परिवार में प्रेम, बच्चों के कल्याण और करुणा की भावना बनाए रखने की प्रार्थना करें।

छठा दिन: मां कात्यायनी

मां कात्यायनी शक्ति, साहस और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक मानी जाती हैं।

मंत्र

ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥

ध्यान श्लोक

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।

कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥

पूजा विधि: मां को पुष्प, अक्षत, धूप और दीप अर्पित करें। मंत्र-जप के बाद आरती करें।

भोग: शहद या अन्य मिठाई कुछ परंपराओं में अर्पित की जाती है।

प्रार्थना: मां से सही निर्णय लेने, सत्य का साथ देने और कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति मांगें।

सातवां दिन: मां कालरात्रि

मां कालरात्रि का स्वरूप भय और नकारात्मकता पर विजय का प्रतीक माना जाता है।

मंत्र

ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥

ध्यान श्लोक

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।

वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

पूजा विधि: मां का ध्यान करें, पुष्प और अक्षत अर्पित करें, सुरक्षित तरीके से धूप-दीप जलाएं तथा मंत्र-जप के बाद आरती करें।

भोग: गुड़ या गुड़ से बनी मिठाई कुछ परंपराओं में चढ़ाई जाती है।

प्रार्थना: भय, क्रोध और नकारात्मक आदतों पर नियंत्रण रखने का संकल्प लें।

आठवां दिन: मां महागौरी

मां महागौरी शांति, पवित्रता और करुणा की प्रतीक मानी जाती हैं। कई परिवारों में अष्टमी पर कन्या पूजन किया जाता है।

मंत्र

ॐ देवी महागौर्यै नमः॥

ध्यान श्लोक

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।

महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥

पूजा विधि: मां को पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। मंत्र-जप और आरती करें।

भोग: नारियल या नारियल से बनी मिठाई कुछ परंपराओं में अर्पित की जाती है।

विशेष अनुष्ठान: स्थानीय पंचांग और पारिवारिक परंपरा के अनुसार कन्या पूजन किया जा सकता है।

नौवां दिन: मां सिद्धिदात्री

मां सिद्धिदात्री नवदुर्गा का नौवां स्वरूप हैं। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें सिद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करने वाली देवी माना जाता है।

मंत्र

ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥

ध्यान श्लोक

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।

सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

पूजा विधि: मां को पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। मंत्र-जप, देवी स्तुति और आरती करें।

भोग: तिल, हलवा, पूड़ी, चना या अन्य सात्त्विक भोजन कुछ परिवारों में अर्पित किया जाता है।

समापन: अपनी परंपरा के अनुसार हवन, कन्या पूजन और नवरात्र पूजा के समापन की विधि अपनाएं।

मंत्र संबंधी सूचना: ध्यान श्लोकों के पाठ में विभिन्न पुस्तकों और परंपराओं में पाठ-भेद मिल सकते हैं। औपचारिक धार्मिक प्रकाशन में संस्कृत की वर्तनी और श्लोकों की पुष्टि किसी मान्य दुर्गा पूजा ग्रंथ या संस्कृत विशेषज्ञ से कराना उचित है।

8. प्रतिदिन देवी स्तुति और दुर्गा चालीसा का पाठ

नौ देवियों के मंत्र-जप के बाद श्रद्धालु दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती या अपनी परंपरा के अनुसार देवी स्तुति पढ़ सकते हैं।

देवी स्तुति

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ करने वाले श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार संकल्प, कवच, अर्गला, कीलक, मुख्य पाठ और समापन की विधि अपनाएं। पूरा पाठ करना संभव न हो तो देवी स्तुति या मंत्र-जप भी श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है।

9. धूप, दीप, नैवेद्य और आरती की विधि

मंत्र-जप और स्तुति के बाद मां दुर्गा को धूप, दीप और भोग अर्पित करें।

धूप अर्पण

ॐ दुर्गायै नमः। धूपमाघ्रापयामि॥

दीप अर्पण

ॐ दुर्गायै नमः। दीपं दर्शयामि॥

नैवेद्य अर्पण

ॐ दुर्गायै नमः। नैवेद्यं निवेदयामि॥

इसके बाद मां दुर्गा की पारंपरिक आरती करें। आरती के दौरान घंटी बजाएं और दीपक को सावधानी से घुमाएं। अंत में सभी श्रद्धालुओं को आरती दिखाकर प्रसाद वितरित करें।

नैवेद्य में फल, मिठाई या परिवार की परंपरा के अनुसार सात्त्विक भोजन अर्पित किया जा सकता है। किसी एक भोग को सभी परिवारों के लिए अनिवार्य नहीं माना जाना चाहिए।

10. नवरात्र व्रत के नियम और सावधानियां

नवरात्र में व्रत रखने की परंपरा अलग-अलग परिवारों में अलग हो सकती है। कुछ लोग पूरे नौ दिन उपवास करते हैं, जबकि कुछ पहले और अंतिम दिन या अष्टमी-नवमी को व्रत रखते हैं।

व्रत के दौरान निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें:

  • अपने परिवार की भोजन संबंधी परंपरा का पालन करें।
  • फलाहार करने वाले लोग अपनी सुविधा के अनुसार फल, दूध, दही और व्रत में स्वीकार्य खाद्य पदार्थ ले सकते हैं।
  • पर्याप्त पानी पिएं और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही उपवास करें।
  • बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और स्वास्थ्य संबंधी समस्या वाले लोगों को कठोर उपवास से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
  • पूजा के साथ संयम, विनम्रता, स्वच्छता और दूसरों की सहायता की भावना रखें।

व्रत का तरीका व्यक्ति की आस्था, स्वास्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार तय किया जा सकता है।

11. अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन की विधि

कई परिवारों में दुर्गाष्टमी या महानवमी के दिन कन्या पूजन की परंपरा है। इसमें कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर सम्मानपूर्वक भोजन और प्रसाद दिया जाता है।

कन्या पूजन का सामान्य क्रम

  1. कन्याओं को आदरपूर्वक आमंत्रित करें।
  2. अपनी परंपरा में प्रचलित हो तो उनकी सहमति और सुविधा के साथ पैर धोएं।
  3. माथे पर तिलक लगाकर पुष्प अर्पित करें।
  4. पूड़ी, चना, हलवा या अन्य पारंपरिक भोजन परोसें।
  5. सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा या उपहार दें।
  6. उनके सम्मान, सुरक्षा और सहजता का पूरा ध्यान रखें।

कन्या पूजन में कन्याओं की उम्र, संख्या और विधि क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार बदल सकती है। किसी भी बच्चे पर धार्मिक अनुष्ठान के लिए दबाव नहीं डालना चाहिए।

तिथि संबंधी सावधानी: 2026 में अष्टमी और महानवमी से जुड़े अनुष्ठान 19 अक्टूबर को पड़ सकते हैं। कन्या पूजन, हवन और पारण का समय स्थानीय पंचांग से सुनिश्चित करें।

12. हवन की संपूर्ण सामान्य विधि और आहुति मंत्र

नवरात्र के अंतिम दिनों में कई परिवार हवन करते हैं। हवन अपनी परंपरा के अनुसार अष्टमी या नवमी को किया जा सकता है। इसे प्रशिक्षित पुरोहित या जानकार व्यक्ति की देखरेख में करना बेहतर है।

हवन की तैयारी

  • हवन कुंड को सुरक्षित, खुली और हवादार जगह पर रखें।
  • कुंड के आसपास ज्वलनशील वस्तुएं न रखें।
  • अपनी परंपरा के अनुसार समिधा, हवन सामग्री और घी तैयार करें।
  • हवन से पहले संकल्प करें और मां दुर्गा का ध्यान करें।
  • पुरोहित के निर्देशानुसार मंत्रों के साथ आहुति दें।

सामान्य देवी आहुति मंत्र

ॐ दुं दुर्गायै नमः स्वाहा॥

प्रत्येक आहुति के समय मंत्र बोलकर निर्धारित सामग्री अर्पित करें। आहुतियों की संख्या, विशेष मंत्र और क्रम अनुष्ठान की परंपरा पर निर्भर करते हैं।

पूर्णाहुति के समय प्रार्थना

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

हवन के बाद आरती और क्षमा प्रार्थना करें। अग्नि पूरी तरह सुरक्षित रूप से बुझने तक उस पर नजर रखें। यदि हवन की व्यवस्था संभव नहीं है, तो सामान्य पूजा, मंत्र-जप और आरती के साथ भी देवी की आराधना की जा सकती है।

13. पूजा के अंत में क्षमा प्रार्थना

पूजा के दौरान मंत्र के उच्चारण, विधि या सामग्री में भूल हो जाए तो अंत में मां से क्षमा मांगने की परंपरा है।

क्षमा प्रार्थना मंत्र

अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।

दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि॥

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।

पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि॥

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।

यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥

इन श्लोकों के बाद हाथ जोड़कर मां दुर्गा को प्रणाम करें और प्रसाद ग्रहण करें।

14. कलश, जौ और पूजा सामग्री का समापन

नवरात्र की पूजा पूरी होने के बाद कलश और पूजा सामग्री का समापन अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार करें।

  • कलश को हटाने से पहले मां दुर्गा को प्रणाम करें।
  • जौ को श्रद्धापूर्वक संभालें और अपनी परंपरा के अनुसार उपयोग या विसर्जित करें।
  • कलश के जल को पौधों में अर्पित किया जा सकता है, यदि उसमें ऐसी सामग्री न हो जो पौधों को नुकसान पहुंचाए।
  • फूल-पत्तियों का स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल निस्तारण करें।
  • प्लास्टिक, कपड़े और अन्य कचरा नदी, तालाब या सार्वजनिक स्थानों पर न फेंकें।

स्थायी प्रतिमा या तस्वीर के लिए विसर्जन अनिवार्य नहीं है। घर की पूजा में प्रणाम करके कलश और पूजन सामग्री का समापन किया जा सकता है।

15. विजयादशमी पर पूजा और नवरात्र का अंतिम समापन

20 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी मनाई जाएगी। यह पर्व धार्मिक परंपराओं में धर्म की विजय और अधर्म के अंत का प्रतीक है।

इस दिन कई परिवार मां दुर्गा की पूजा करते हैं, शस्त्र या औजारों का पूजन करते हैं और नए कार्यों के लिए शुभकामना लेते हैं। सार्वजनिक दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के समय स्थानीय प्रशासन के दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए।

नवरात्र पूजा का समापन अपनी परंपरा के अनुसार आरती, क्षमा प्रार्थना, प्रसाद वितरण और कलश के समापन के साथ किया जा सकता है। नवमी हवन, पारण और विसर्जन के समय का निर्णय स्थानीय पंचांग के अनुसार करें।

16. मां दुर्गा की अंतिम प्रार्थना

नवरात्र की पूजा के अंत में मां दुर्गा के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना करें।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।

गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥

सरल भावार्थ: हे मां दुर्गा! हमारी पूजा स्वीकार करें। हमें सद्बुद्धि, साहस, करुणा और सत्य के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें। हमारे परिवार और समाज में सुख, शांति तथा सद्भाव बनाए रखें।

नवरात्र का संदेश केवल पूजा-पाठ और उपवास तक सीमित नहीं है। यह शक्ति के साथ विवेक, भक्ति के साथ विनम्रता और आराधना के साथ सेवा की भावना अपनाने का अवसर भी है। मां दुर्गा की पूजा के साथ महिलाओं का सम्मान, जरूरतमंदों की सहायता और समाज में सद्भाव बनाए रखने का संकल्प भी इस पर्व की भावना को मजबूत करता है।

दैनिक भारतवर्ष की अपील

नवरात्र के दौरान मंदिरों और पूजा-पंडालों में स्वच्छता बनाए रखें, बच्चों और बुजुर्गों का ध्यान रखें तथा धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा और व्यवस्था के नियमों का पालन करें।

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