अष्टमी की रात्रि में सात्त्विक दुर्गा उपासना, मनोकामना संकल्प, मंत्र-जप और दुर्गा सप्तशती पाठ से करें पारिवारिक सुख-शांति व मंगल की प्रार्थना; जानें पूजन सामग्री, जप संख्या और समापन की विधि
धार्मिक | दैनिक भारतवर्ष
सात्त्विक दुर्गा उपासना में अष्टमी की रात्रि को आप माँ दुर्गा के ध्यान, स्तुति, मंत्र-जप, देवी-माहात्म्य के पाठ और परिवार के कल्याण के संकल्प के साथ बिता सकते हैं। इस अनुष्ठान का केंद्र किसी चमत्कार की अपेक्षा श्रद्धा, आत्मसंयम, सद्बुद्धि, पारिवारिक सद्भाव और धर्मसम्मत मनोकामना होना चाहिए।
नीचे पूरी रात्रि के लिए सामग्री, संकल्प, मंत्रों का शुद्ध पाठ, जप-संख्या, समय-सारणी और समापन की विधि दी गई है। जहाँ किसी विधि का आधार स्थापित ग्रंथ-परंपरा में है और जहाँ वह सामान्य गृह-पूजा की सुविधाजनक व्यवस्था है, वहाँ दोनों के बीच अंतर भी स्पष्ट किया गया है।
1. पूजा की सामग्री
मुख्य सामग्री
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माँ दुर्गा या माँ महागौरी का चित्र अथवा प्रतिमा
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स्वच्छ लाल या पीला कपड़ा और आसन
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जल का पात्र, रोली, कुमकुम और अक्षत
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लाल या सफेद पुष्प, उपलब्ध हों तो पुष्पमाला
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घी का दीपक, रुई की बत्ती और धूप
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फल, मिठाई या घर में बना सात्त्विक भोग
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घंटी, पूजा की थाली और स्वच्छ चम्मच
पाठ और जप की सामग्री
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दुर्गा सप्तशती या देवी स्तुति की पुस्तक
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जप के लिए माला, यदि उपलब्ध हो
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मनोकामना और पारिवारिक मंगल लिखने के लिए कागज, वैकल्पिक
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पीने का पानी और रात में विश्राम के लिए सुविधाजनक स्थान
कलश, 108 दीपक, विशेष रत्न, महँगी माला या दुर्लभ पुष्प इस सरल गृह-अनुष्ठान के लिए अनिवार्य नहीं हैं।
2. अनुष्ठान आरंभ करने से पहले
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स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
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पूजा-स्थान साफ करें और माँ दुर्गा का चित्र स्थापित करें।
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पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें, यदि सुविधाजनक हो।
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दीपक और धूप जलाएँ। अग्नि को सुरक्षित स्थान पर रखें।
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कुछ मिनट सामान्य श्वास पर ध्यान लगाकर मन को शांत करें।
यदि आप व्रत रखते हैं, तो अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार रखें। पूरी रात उपवास या जागरण करना अनिवार्य नहीं है।
3. संकल्प की पूरी विधि
दाहिने हाथ में थोड़ा जल लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करें। संकल्प संस्कृत में ही करना आवश्यक नहीं है। आप यह संकल्प बोल सकते हैं:
हे माँ दुर्गा, जगज्जननी आदिशक्ति! मैं आज श्रद्धा और भक्ति से आपकी सात्त्विक उपासना का संकल्प करता/करती हूँ। इस पूजा का उद्देश्य मेरे परिवार में सुख-शांति, स्वास्थ्य, सद्बुद्धि, प्रेम, सदाचार और समृद्धि की वृद्धि है।
हमारे परिवार से कलह, द्वेष, भय और नकारात्मक विचार दूर हों। हमें कठिन परिस्थितियों में धैर्य, सही निर्णय लेने की बुद्धि और अपने कर्तव्यों का पालन करने की शक्ति दें।
मेरी जो मनोकामना धर्मसम्मत और किसी के अहित से रहित है, उसके लिए उचित मार्ग प्रशस्त करें। मेरी पूजा में कोई त्रुटि हो तो क्षमा करें। यह उपासना आपको समर्पित है।
इसके बाद जल को पूजा-स्थान में छोड़ दें।
यह सरल संकल्प है, किसी प्राचीन ग्रंथ से शब्दशः उद्धृत मंत्र नहीं।
संकल्प कैसे लें? जानें संस्कृत संकल्प मंत्र
संकल्प का अर्थ है पूजा का उद्देश्य निश्चित करना। इसमें श्रद्धालु मां दुर्गा की आराधना का निश्चय करते हैं और अपने परिवार की सुख-शांति तथा कल्याण की कामना करते हैं।
संकल्प लेने की विधि
- पूजा आसन पर बैठें और मां दुर्गा का ध्यान करें।
- दाहिने हाथ में थोड़ा जल, पुष्प और अक्षत लें।
- अपना नाम, गोत्र, स्थान, तिथि और पूजा का उद्देश्य मन में रखें।
- नीचे दिया गया सामान्य संकल्प बोलें।
- अंत में हाथ में लिया हुआ जल पूजा पात्र में छोड़ दें।
दाहिने हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर अपना नाम, गोत्र, स्थान और पूजा का उद्देश्य मन में रखें। नौ दिनों का व्रत करने वाले अपने संकल्प में नौ दिन की पूजा का उल्लेख कर सकते हैं।
सामान्य संस्कृत संकल्प
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः।
श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्यैतस्य ब्रह्मणोह्नि द्वितीये परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भूर्लोके भारतवर्षे जम्बूद्विपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तस्य भारत क्षेत्रे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र मण्डलान्तरगते नई दिल्ली नाम्निनगरे (ग्रामे वा) श्रीगड़्गायाः ………… (उत्तरे/दक्षिणे) दिग्भागे देवब्राह्मणानां सन्निधौ श्रीमन्नृपतिवीरविक्रमादित्यसमयतः 2083 संख्या-परिमिते प्रवर्त्तमानसंवत्सरे प्रभवादिषष्ठि-संवत्सराणां मध्ये सिद्धार्थी नामसंवत्सरे, दक्षिणायण अयने, शरद ऋतौ, आश्विन मासे, शुक्ल पक्षे, महाष्टमीतिथौ, रविवार वासरे, पूर्वाषाढा नक्षत्रे, सुकर्मयोगे, वणिजकरणे, सर्वे ग्रहाः यथायथा राशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ………… गोत्रोत्पन्नस्य ………… शर्मणः (वर्मणः, गुप्तस्य वा) सपरिवारस्य ममात्मनः अहं ………… श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त-पुण्य-फलप्राप्त्यर्थं मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य क्षेमस्थैर्यायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्ध्यर्थमाधिभौतिकाधि-दैविकाध्यात्मिकत्रिविधतापशमनार्थं धर्मार्थकाममोक्षफलप्राप्त्यर्थं नित्यकल्याणलाभाय, श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थं, सकलकुटुम्बस्य सुखशान्तिस्वास्थ्यसमृद्ध्यर्थं, सर्वविघ्नोपशमनार्थम्, धर्मसम्मतमनोरथसिद्ध्यर्थम्, श्रीजगदम्बादुर्गादेवीप्रीत्यर्थं च, शारदीयनवरात्रस्य महाष्टम्यां रात्रौ श्रद्धाभक्तिपूर्वकं सात्त्विकश्रीदुर्गापूजनं, मन्त्रजपं, देवीस्तुतिपाठं च करिष्ये॥
तत्सर्वं श्रीजगदम्बार्पणमस्तु॥
इसके बाद हाथ में लिया जल पूजा पात्र में छोड़ दें।
सरल हिंदी भावार्थ: मैं अपने परिवार के कल्याण, सुख, शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना से मां दुर्गा की नवरात्र की महाष्टमी तिथि की पूजा का संकल्प लेता/लेती हूं।
ध्यान दें: यह एक सामान्य संकल्प-प्रारूप है। यहां संकल्प में दी गई जानकारी को वास्तविक पंचांग और अपनी परिस्थिति के अनुसार भरें। कोष्ठक में अपना नाम, स्थान, तिथि और अन्य विवरण भरें। पारंपरिक वैदिक संकल्प में देश, काल, संवत्सर, मास, पक्ष, तिथि, गोत्र और पूजा के उद्देश्य का विस्तृत उल्लेख हो सकता है। शुद्ध पंचांग-आधारित संकल्प के लिए पुरोहित से पुष्टि करें।
4. देवी का ध्यान और प्रारंभिक पूजा
सबसे पहले माँ दुर्गा का स्मरण करें। इसके बाद पुष्प अर्पित करके निम्न मंत्र पढ़ें:
ॐ देवी महागौर्यै नमः॥
यह माँ महागौरी के प्रति प्रणाम का मंत्र है। अष्टमी की परंपरा में महागौरी की उपासना विशेष रूप से प्रचलित है।
फिर सामान्य उपचार अर्पित करें:
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जल अर्पित करें।
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पुष्प और अक्षत चढ़ाएँ।
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धूप और दीप दिखाएँ।
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फल या सात्त्विक भोग रखें।
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हाथ जोड़कर परिवार के मंगल की प्रार्थना करें।
पूजा की सामग्री कम हो तो मानसिक रूप से अर्पण करना भी गृह-भक्ति का सरल विकल्प है।
5. मुख्य मंत्र-जप: कितनी बार और कैसे?
आपके उद्देश्य के लिए एक मंत्र को मुख्य जप बनाना बेहतर है। नीचे तीन विकल्प हैं।
मंत्र 1 — सरल दुर्गा मंत्र
ॐ दुं दुर्गायै नमः॥
जप-संख्या: 108 बार।
विधि: आराम से बैठें, मंत्र स्पष्ट बोलें या मानसिक जप करें। हर बार मन में देवी के प्रति श्रद्धा और परिवार के मंगल का भाव रखें।
भावार्थ: माँ दुर्गा को प्रणाम; उनसे साहस, विवेक और कल्याणकारी जीवन की शक्ति की प्रार्थना।
मंत्र 2 — सर्वमंगल स्तुति
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
पाठ-संख्या: 11 या 21 बार।
यह देवी-माहात्म्य की प्रसिद्ध स्तुति है। इसमें देवी को कल्याणकारी, शरण देने वाली और समस्त मंगलों का आधार मानकर प्रणाम किया जाता है।
मंत्र 3 — दुर्गा नवार्ण मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
यह शाक्त परंपरा का प्रसिद्ध बीज-मंत्र है, जिसका प्रयोग दुर्गा सप्तशती की अनेक पूजा-पद्धतियों में होता है। इसके विशेष विनियोग, न्यास और पुरश्चरण की विधियाँ परंपरा-विशिष्ट हो सकती हैं। यदि आप केवल सामान्य गृह-उपासना कर रहे हैं, तो पहले मंत्र को मुख्य जप रखना पर्याप्त है।
जप के विषय में स्पष्टता: 108, 11 और 21 जैसी संख्याएँ प्रचलित पूजा-पद्धति की सुविधाजनक संख्याएँ हैं। इनमें से किसी संख्या को मनोकामना निश्चित पूरी करने की गारंटी नहीं समझना चाहिए।
6. दुर्गा सप्तशती का पाठ
देवी-माहात्म्य, जिसे दुर्गा सप्तशती भी कहा जाता है, मार्कण्डेय पुराण से संबद्ध प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसके 13 अध्यायों में देवी की महिमा, असुरों पर विजय और देवी-उपासना का वर्णन है।
आप तीन में से कोई एक विकल्प चुन सकते हैं:
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विकल्प A: पूरी दुर्गा सप्तशती का पाठ, यदि आप उसकी निर्धारित पाठ-विधि जानते हैं और पर्याप्त समय है।
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विकल्प B: सप्तश्लोकी दुर्गा का पाठ, यदि संक्षिप्त देवी-स्तुति करना चाहते हैं।
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विकल्प C: देवी-माहात्म्य के किसी परिचित अध्याय या देवी-स्तुति का श्रद्धापूर्वक पाठ।
पूरा पाठ करने के लिए पुस्तक में दी गई पाठ-विधि का अनुसरण करें। विशेष न्यास, विनियोग, कवच, अर्गला, कीलक और अन्य अंगों के क्रम में अपनी मान्य पाठ-परंपरा का पालन करना उचित है। केवल रात भर पाठ करने के लिए अनिवार्य रूप से पूरी पुस्तक समाप्त करने का दबाव न लें।
7. पूरी रात्रि की समय-सारणी
यह समय-सारणी आपके लिए बनाई गई व्यावहारिक योजना है, कोई अनिवार्य शास्त्रीय मुहूर्त नहीं।
8–9 बजे
शुद्धि, संकल्प और पूजा
स्नान, आसन, दीप प्रज्वलन, माँ का ध्यान, पुष्प अर्पण और मनोकामना का संकल्प।
9–10 बजे
मंत्र-जप
ॐ दुं दुर्गायै नमः — 108 बार। अंत में कुछ मिनट शांत बैठें।
10–11 बजे
देवी स्तुति या ग्रंथ-पाठ
दुर्गा सप्तशती, सप्तश्लोकी दुर्गा अथवा सर्वमंगल स्तुति का पाठ।
11–12 बजे
मनोकामना पर ध्यान
अपनी इच्छा को धर्मसम्मत और सभी के हित से जोड़कर दोहराएँ। परिवार के सदस्यों के प्रति कृतज्ञता और क्षमा का भाव रखें।
12–2 बजे
रात्रि-जागरण
शांत देवी-भजन, नाम-स्मरण या मौन ध्यान करें। आवश्यकता हो तो पानी पिएँ और विश्राम करें।
2 बजे से प्रातः
समापन की तैयारी
कुछ देर ध्यान, देवी स्तुति और क्षमा-प्रार्थना करें। प्रातःकाल आरती, भोग और प्रसाद के साथ पूजा पूरी करें।
आप चाहें तो इस पूरी अवधि में एक ही मंत्र का बार-बार जप कर सकते हैं, लेकिन अनिवार्य रूप से हजारों जप पूरे करना आवश्यक नहीं है। नींद की कमी या अस्वस्थता होने पर पूरी रात जागना छोड़कर विश्राम करना उचित है।
8. हवन और कन्या-पूजन कब करें?
हवन: यदि आपके परिवार में अष्टमी या नवमी पर हवन की परंपरा है, तो प्रशिक्षित पुरोहित के मार्गदर्शन में सुरक्षित सात्त्विक हवन कर सकते हैं। हवन-मंत्र, आहुति-संख्या और संकल्प की विधि पूजा-पद्धति के अनुसार बदलती है।
कन्या-पूजन: अष्टमी या नवमी के दिन स्थानीय और पारिवारिक परंपरा के अनुसार किया जाता है। कन्याओं का सम्मान, उनकी सहमति, स्वच्छ भोजन और सहज व्यवहार महत्त्वपूर्ण हैं। रात भर के अनुष्ठान के कारण बच्चों को देर रात जगाना आवश्यक नहीं है।
संधि-पूजा: इसे आधी रात की पूजा न समझें। यह अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के शुरुआती 24 मिनट के संधिकाल में की जाने वाली विशेष पूजा है। 2026 में उपलब्ध पंचांग के अनुसार यह समय 19 अक्टूबर की सुबह लगभग 10:27 से 11:15 बजे बताया गया है; अपने स्थान के पंचांग से समय की पुष्टि करें।
9. शास्त्रीय आधार और लोक-मान्यताएँ
| विषय | स्पष्ट स्थिति |
|---|---|
| दुर्गा सप्तशती और देवी-माहात्म्य का पाठ | स्थापित धार्मिक ग्रंथ-परंपरा का हिस्सा |
| देवी के मंत्र और स्तुतियों का जप | प्रचलित पूजा-पद्धतियों का हिस्सा |
| अष्टमी-नवमी संधिकाल में संधि-पूजा | स्थापित शाक्त एवं क्षेत्रीय परंपरा |
| रात भर जागने से मनोकामना अवश्य पूरी होना | ऐसी निश्चित गारंटी को प्रमाणित तथ्य नहीं कहा जा सकता |
| किसी खास संख्या में जप से निश्चित चमत्कार होना | इसके लिए सार्वभौमिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है |
| विशेष रंग, दुर्लभ सामग्री या महँगे चढ़ावे के बिना पूजा निष्फल होना | सामान्य सात्त्विक गृह-उपासना के लिए ऐसी अनिवार्यता नहीं माननी चाहिए |
10. अनुष्ठान का समापन
प्रातःकाल या अपनी पारिवारिक पूजा-पद्धति के निर्धारित समय पर:
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माँ दुर्गा की आरती करें।
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पुष्प अर्पित करके अपनी मनोकामना दोहराएँ।
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पूजा में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा माँगें।
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भोग को प्रसाद के रूप में परिवार में बाँटें।
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अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी जरूरतमंद की सहायता या अन्नदान करें।
समापन में यह प्रार्थना कर सकते हैं:
हे माँ दुर्गा! इस उपासना में हुई त्रुटियों को क्षमा करें। मेरे परिवार में प्रेम, सद्बुद्धि, स्वास्थ्य, धैर्य और सदाचार बनाए रखें। हमें कठिनाइयों से निपटने की शक्ति दें और हमारी इच्छाओं को धर्म, विवेक और सबके कल्याण के अनुरूप पूरा करने का मार्ग दिखाएँ।
जय माता दी।।















