प्रारूप मतदाता सूची में 21.14 प्रतिशत नाम शामिल नहीं होने पर कांग्रेस का हमला तेज; निर्वाचन अधिकारियों ने कहा—दावा और आपत्ति की प्रक्रिया के बाद बदलेगा अंतिम आंकड़ा
न्यूज़ डेस्क : नई दिल्ली | दैनिक भारतवर्ष
2.07 करोड़ नामों से गरमाई देश की राजनीति: महाराष्ट्र SIR पर राहुल गांधी का बड़ा सवाल
नई दिल्ली/मुंबई: महाराष्ट्र में विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) के बाद जारी प्रारूप मतदाता सूची को लेकर देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। प्रारूप सूची में करीब 2.07 करोड़ मतदाताओं के नाम शामिल नहीं होने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं और इसे अपने पहले से उठाए जा रहे ‘वोट चोरी’ के मुद्दे से जोड़ा है।
हालांकि, निर्वाचन अधिकारियों की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि प्रारूप सूची में नाम शामिल नहीं होने का अर्थ यह नहीं है कि सभी नाम अंतिम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। जिन पात्र मतदाताओं के नाम प्रारूप सूची में नहीं हैं, उनके लिए दावा और आपत्ति की प्रक्रिया उपलब्ध है।
राहुल गांधी ने क्या सवाल उठाए?
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने महाराष्ट्र की नई प्रारूप मतदाता सूची के आंकड़ों का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची में शामिल नहीं होने के पीछे क्या कारण हैं।
उन्होंने इस मुद्दे को भारतीय जनता पार्टी और निर्वाचन प्रक्रिया से जोड़ते हुए राजनीतिक आरोप लगाए। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और पार्टी के अन्य नेताओं ने भी मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं।
राहुल गांधी का मुख्य तर्क यह है कि अलग-अलग समय पर महाराष्ट्र के मतदाता आंकड़ों में बड़े बदलाव दिखाई दे रहे हैं और इसकी पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
प्रारूप सूची में कितने मतदाता शामिल और कितने बाहर?
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, SIR से पहले महाराष्ट्र की मतदाता सूची में लगभग 9.78 करोड़ मतदाता दर्ज थे। नई प्रारूप सूची में करीब 7.72 करोड़ मतदाताओं के नाम शामिल किए गए हैं।
करीब 2,06,88,487 मतदाता, यानी लगभग 21.14 प्रतिशत, प्रारूप सूची में इस चरण पर शामिल नहीं हो सके। निर्वाचन अधिकारियों के अनुसार, इनमें अलग-अलग श्रेणियां शामिल हैं, जैसे—मतदाता का अनुपस्थित या नहीं मिलना, स्थायी रूप से स्थानांतरित होना, मृत्यु, किसी अन्य स्थान पर पहले से पंजीकरण या डुप्लीकेट रिकॉर्ड तथा अन्य कारण।
क्या 2.07 करोड़ मतदाता स्थायी रूप से हट गए हैं?
यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
निर्वाचन अधिकारियों के अनुसार, 2.07 करोड़ का आंकड़ा अंतिम रूप से हटाए गए मतदाताओं की संख्या नहीं है। यह फिलहाल प्रारूप मतदाता सूची का आंकड़ा है।
प्रारूप सूची जारी होने के बाद मतदाताओं को अपने नाम की जांच करने और आवश्यकता पड़ने पर दावा या आपत्ति दर्ज कराने का अवसर दिया गया है। पात्र मतदाता आवश्यक प्रक्रिया पूरी कर अपने नाम को अंतिम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
इसलिए राजनीतिक बहस के बीच यह अंतर समझना जरूरी है कि ‘प्रारूप सूची में नाम नहीं होना’ और ‘अंतिम रूप से मतदाता सूची से नाम हट जाना’ एक ही बात नहीं है।
दावा और आपत्ति की प्रक्रिया कब तक?
महाराष्ट्र में SIR की प्रारूप मतदाता सूची पर दावा और आपत्ति दर्ज करने की प्रक्रिया 31 अगस्त से 30 सितंबर 2026 तक निर्धारित की गई है।
जिन पात्र मतदाताओं का नाम प्रारूप सूची में नहीं है, वे निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन कर सकते हैं। नाम में सुधार, गलत विवरण में संशोधन और अन्य आवश्यक चुनावी दावों के लिए भी संबंधित प्रावधान उपलब्ध हैं।
अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने से पहले दावों और आपत्तियों की जांच की जाएगी, इसलिए वर्तमान आंकड़ों में आगे बदलाव संभव है।
महाराष्ट्र में क्यों बढ़ा राजनीतिक विवाद?
महाराष्ट्र की राजनीति देश की राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण स्थान रखती है। ऐसे में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम प्रारूप सूची में शामिल नहीं होने के आंकड़े ने विपक्ष को सरकार और निर्वाचन प्रक्रिया पर सवाल उठाने का अवसर दिया है।
कांग्रेस इस मुद्दे को मतदाता अधिकार और चुनावी पारदर्शिता से जोड़ रही है। दूसरी ओर, उपलब्ध चुनावी अधिकारियों की जानकारी के अनुसार SIR एक प्रक्रिया है, जिसमें पुराने रिकॉर्ड की जांच, सत्यापन और अद्यतन के बाद अंतिम सूची तैयार की जाती है।
राजनीतिक आरोपों से अलग, अंतिम निष्कर्ष इस बात पर निर्भर करेगा कि दावा और आपत्ति की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अंतिम मतदाता सूची में कितने नाम शामिल होते हैं और कितने रिकॉर्ड में वास्तविक संशोधन किया जाता है।
लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता क्यों महत्वपूर्ण?
मतदाता सूची किसी भी चुनाव की मूल आधारशिला होती है। एक ओर मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट नामों को हटाना आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि कोई पात्र नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित न हो।
महाराष्ट्र SIR विवाद ने एक बार फिर दो महत्वपूर्ण मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है—
- मतदाता सूची की शुद्धता
- पुनरीक्षण प्रक्रिया की पारदर्शिता
आने वाले दिनों में दावा और आपत्ति की प्रक्रिया तथा अंतिम मतदाता सूची इस राजनीतिक विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
दैनिक भारतवर्ष का निष्कर्ष
महाराष्ट्र की SIR प्रारूप मतदाता सूची में लगभग 2.07 करोड़ नाम शामिल नहीं होने के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। राहुल गांधी और कांग्रेस इसे चुनावी पारदर्शिता और ‘वोट चोरी’ के अपने आरोपों से जोड़ रहे हैं, जबकि चुनावी अधिकारियों के अनुसार वर्तमान सूची प्रारूप चरण में है और पात्र मतदाताओं को अपने नाम शामिल कराने का अवसर दिया गया है।
ऐसे में अंतिम मतदाता सूची जारी होने से पहले किसी भी नाम के स्थायी रूप से हटने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। फिलहाल यह मुद्दा केवल महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि देश की व्यापक राजनीतिक बहस का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है।
दैनिक भारतवर्ष
“व्यूज़ नहीं, न्यूज़ की बात”

















