जितिया व्रत में नहाय-खाय से लेकर निर्जला उपवास, जीमूतवाहन-पूजन, चील्हो-सियारो की कथा, संकल्प, प्रार्थना और नवमी के पारण तक जानिए पूरा विधान
धार्मिक डेस्क : रोहतास | दैनिक भारतवर्ष
सासाराम/नई दिल्ली: जीवित्पुत्रिका व्रत को जितिया, जिउतिया या जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश तथा नेपाल के कई क्षेत्रों में इसकी विशेष लोक-परंपरा है।
पारंपरिक मान्यता में माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सुख-समृद्धि की कामना से यह कठिन व्रत करती हैं। मुख्य व्रत के दिन निर्जला उपवास रखने की परंपरा है और अगले दिन नवमी में पारण किया जाता है।
स्थानानुसार अंतर हो सकता है।
जीवित्पुत्रिका व्रत का तीन दिवसीय क्रम
1. सप्तमी — नहाय-खाय
व्रत से एक दिन पहले स्नान करके शुद्धता के साथ सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है। बिहार-झारखंड के कई इलाकों में इस दिन पारंपरिक भोजन का विशेष महत्व है।
नहाय-खाय के बाद व्रती अगले दिन के निर्जला व्रत की तैयारी करती हैं।
2. अष्टमी — मुख्य जितिया व्रत
अष्टमी को व्रती निर्जला उपवास रखती हैं। इसी दिन भगवान जीमूतवाहन की पूजा, जीवित्पुत्रिका व्रत कथा तथा चील्हो-सियारो की कथा का श्रवण किया जाता है।
3. नवमी — पारण
नवमी तिथि में निर्धारित पारण समय के अनुसार व्रत खोला जाता है। पारण के बाद सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है। यथाशक्ति दान-पुण्य करने की भी परंपरा है।
जीवित्पुत्रिका व्रत की पूजा सामग्री
क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार सामग्री में कुछ अंतर हो सकता है। सामान्य रूप से निम्न सामग्री रखी जाती है—
- कुशा से बनी जीमूतवाहन की प्रतिमा
- गाय का गोबर या मिट्टी
- चील्हो और सियारो के प्रतीक
- अक्षत
- रोली/सिंदूर
- चंदन
- पुष्प
- दूर्वा
- धूप
- दीपक
- घी या तेल
- फल
- मिठाई/पेड़ा
- पान
- सुपारी
- लौंग और इलायची
- लाल या पीला वस्त्र
- जिउतिया का धागा
- सरसों का तेल
- खली
- पूजा के लिए आवश्यक पारंपरिक सामग्री
जीमूतवाहन, चील्हो और सियारो की पूजा तथा कुशा की प्रतिमा का उल्लेख विभिन्न पूजा-विधि स्रोतों में मिलता है।
जीवित्पुत्रिका व्रत की विस्तृत पूजा-विधि और अर्पण मंत्र
1. पूजा की तैयारी
पूजा के लिए स्वच्छ स्थान पर चौकी रखें और उस पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं। उसके ऊपर:
- भगवान गणेश का स्वरूप
- कुश से जीमूतवाहन का स्वरूप
- गोबर/मिट्टी से चील्हो और सियारिन
- कलश
- दीपक
- पूजा की अन्य सामग्री रखें।
जीमूतवाहन की कुशा-प्रतिमा तथा चील्हो-सियारिन के प्रतीक बनाने की परंपरा वर्तमान जितिया पूजा-विधियों में भी वर्णित है।
2. आचमन
दाहिने हाथ में थोड़ा जल लेकर तीन बार निम्न मंत्र बोलें और प्रत्येक बार थोड़ा जल ग्रहण करें—
ॐ केशवाय नमः।
ॐ नारायणाय नमः।
ॐ माधवाय नमः।
फिर हाथ धोकर कहें—
ॐ गोविन्दाय नमः।
3. शुद्धिकरण
थोड़ा जल हाथ में लेकर अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर छिड़कें—
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा
सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं
स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
इसके बाद—
ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः।
4. आसन शुद्धि
पूजा के आसन पर थोड़ा जल छिड़कते हुए—
ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका
देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि
पवित्रं कुरु चासनम्॥
5. गणेश जी का ध्यान
सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें—
वक्रतुण्ड महाकाय
सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव
शुभकार्येषु सर्वदा॥
फिर—
ॐ गं गणपतये नमः।
का जाप करें।
6. गणेश जी को स्नान कराने का मंत्र
यदि गणेश जी की प्रतिमा है तो पहले जल अर्पित करें—
ॐ गं गणपतये नमः।
स्नानं समर्पयामि।
फिर पंचामृत से स्नान कराना हो तो—
ॐ गं गणपतये नमः।
पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि।
इसके बाद स्वच्छ जल—
ॐ गं गणपतये नमः।
शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि।
7. संकल्प
अब दाहिने हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प करें।
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः।
ममोपात्तसमस्तदुरितक्षयद्वारा
श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं
मम पुत्र-पुत्री-सन्तानानां
दीर्घायुरारोग्य-सुखसमृद्ध्यर्थं
सर्वापद्विनाशनार्थं च
जीवित्पुत्रिका-व्रतं करिष्ये।
इसके बाद अपना नाम, गोत्र और स्थान बोलें।
उदाहरण—
अहं [अपना नाम]
[अपना गोत्र]
अश्विनमासे कृष्णपक्षे अष्टमीतिथौ
जीवित्पुत्रिका-व्रतमहं करिष्ये।
श्रीजीमूतवाहनदेवस्य पूजनं
व्रतकथाश्रवणं च करिष्ये।
फिर हाथ का जल भूमि पर छोड़ दें।
8. कलश स्थापना
कलश में जल भरकर उसमें अक्षत, पुष्प और संभव हो तो दूर्वा डालें।
कलश पर मौली बांधें और ऊपर आम के पत्ते तथा नारियल रखें।
कलश को प्रणाम करते हुए—
ॐ कलशस्य मुखे विष्णुः
कण्ठे रुद्रः समाश्रितः।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा
मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥
कुक्षौ तु सागराः सर्वे
सप्तद्वीपा वसुन्धरा।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः
सामवेदो ह्यथर्वणः॥
अङ्गैश्च सहिताः सर्वे
कलशाम्बु समाश्रिताः।
इसके बाद—
ॐ वरुणाय नमः।
9. दीप पूजन
दीपक जलाकर—
ॐ दीपज्योतिः परं ब्रह्म
दीपज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं
दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
फिर—
ॐ दीपाय नमः।
10. जीमूतवाहन का ध्यान
अब पूजा के मुख्य देवता राजा जीमूतवाहन का ध्यान करें।
हाथ में पुष्प लेकर—
हे त्यागमूर्ति जीमूतवाहन!
हे नागवंशरक्षक!
हे करुणामय महात्मन्!
संतानों की रक्षा एवं उनके दीर्घ जीवन की कामना से मैं आपका स्मरण और पूजन करती/करता हूं।
मेरे परिवार तथा समस्त संतानों पर अपनी कृपा बनाए रखें।
फिर—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
यह सरल नाम-मंत्र आधुनिक जितिया पूजा-विधियों में भी प्रयुक्त होता है; लेकिन इसे किसी विशेष वैदिक ऋचा के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
11. जीमूतवाहन को आवाहन
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि।
12. आसन अर्पण
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
आसनं समर्पयामि।
फूल या अक्षत अर्पित करें।
13. पाद्य
पैर धोने के प्रतीक के रूप में जल अर्पित करें—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
पाद्यं समर्पयामि।
14. अर्घ्य
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
अर्घ्यं समर्पयामि।
15. आचमनीय
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
आचमनीयं समर्पयामि।
16. स्नान
जल अर्पित करें—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
स्नानं समर्पयामि।
यदि पंचामृत उपलब्ध हो—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि।
फिर स्वच्छ जल—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि।
17. वस्त्र अर्पण
कुशा प्रतिमा के सामने नया वस्त्र अथवा मौली/कलावा प्रतीक रूप में अर्पित करें—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
वस्त्रं समर्पयामि।
18. यज्ञोपवीत
यदि आपकी स्थानीय परंपरा में हो—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
यज्ञोपवीतं समर्पयामि।
19. चंदन
चंदन अर्पित करते हुए—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
गन्धान् धारयामि।
या सरल रूप में—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
चन्दनं समर्पयामि।
20. अक्षत
अक्षत अर्पित करते हुए—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
अक्षतान् समर्पयामि।
21. पुष्प
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
पुष्पं समर्पयामि।
फूल अर्पित करें।
22. पुष्पमाला
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
पुष्पमालां समर्पयामि।
23. दूर्वा
जितिया पूजा में दूर्वा का विशेष लोकाचार मिलता है।
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
दूर्वां समर्पयामि।
24. सिंदूर/कुमकुम
जीमूतवाहन के स्वरूप में आपकी पारिवारिक परंपरा के अनुसार चंदन या कुमकुम लगाया जा सकता है—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
कुङ्कुमं समर्पयामि।
नोट: उपलब्ध पूजा-विधियों में जीमूतवाहन को चंदन/कुमकुम और चील्हो-सियारिन को सिंदूर लगाने की परंपरा मिलती है।
25. धूप
धूप जलाकर—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
धूपमाघ्रापयामि।
26. दीप
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
दीपं दर्शयामि।
27. नैवेद्य
मिठाई, पेड़ा, फल अथवा स्थानीय परंपरा के अनुसार नैवेद्य रखें।
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
नैवेद्यं निवेदयामि।
इसके बाद—
ॐ प्राणाय स्वाहा।
ॐ अपानाय स्वाहा।
ॐ व्यानाय स्वाहा।
ॐ उदानाय स्वाहा।
ॐ समानाय स्वाहा।
फिर—
ॐ ब्रह्मणे स्वाहा।
28. फल अर्पण
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
फलं समर्पयामि।
29. पान-सुपारी
पान अर्पित करते हुए—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
ताम्बूलं समर्पयामि।
सुपारी—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
पूगीफलं समर्पयामि।
30. दक्षिणा
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
दक्षिणां समर्पयामि।
31. चील्हो और सियारिन की पूजा
अब गोबर या मिट्टी से बनाए गए चील्हो और सियारिन के प्रतीकों की पूजा करें।
सबसे पहले—
ॐ चील्ह्यै नमः।
ॐ सियारिन्यै नमः।
फिर दोनों को जल का प्रतीकात्मक अर्पण—
ॐ चील्ह्यै नमः। स्नानं समर्पयामि।
ॐ सियारिन्यै नमः। स्नानं समर्पयामि।
चंदन—
ॐ चील्ह्यै नमः। गन्धं समर्पयामि।
ॐ सियारिन्यै नमः। गन्धं समर्पयामि।
अक्षत—
ॐ चील्ह्यै नमः। अक्षतान् समर्पयामि।
ॐ सियारिन्यै नमः। अक्षतान् समर्पयामि।
सिंदूर—
ॐ चील्ह्यै नमः। सिन्दूरं समर्पयामि।
ॐ सियारिन्यै नमः। सिन्दूरं समर्पयामि।
फूल—
ॐ चील्ह्यै नमः। पुष्पं समर्पयामि।
ॐ सियारिन्यै नमः। पुष्पं समर्पयामि।
धूप—
ॐ चील्ह्यै नमः। धूपमाघ्रापयामि।
ॐ सियारिन्यै नमः। धूपमाघ्रापयामि।
दीप—
ॐ चील्ह्यै नमः। दीपं दर्शयामि।
ॐ सियारिन्यै नमः। दीपं दर्शयामि।
नैवेद्य—
ॐ चील्ह्यै नमः। नैवेद्यं निवेदयामि।
ॐ सियारिन्यै नमः। नैवेद्यं निवेदयामि।
इन नाम-मंत्रों को स्थानीय लोकपूजा के सरल आवाहन-मंत्र के रूप में समझना चाहिए, न कि किसी प्राचीन वेद-मंत्र के रूप में।
32. जिउतिया/जितिया धागे की पूजा
जितिया धागा पूजा में रखें और उस पर अक्षत-पुष्प अर्पित करें।
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
जीवित्पुत्रिका-सूत्रं पूजयामि।
फिर—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
मम सन्तानानां दीर्घायुरारोग्यसौभाग्यसिद्ध्यर्थं
जीवित्पुत्रिका-सूत्रं धारयिष्ये।
इसके बाद परिवार की परंपरा के अनुसार गले में धारण करें।
झारखंड में भी जिउतिया धागा धारण करने और संतानों के दीर्घ जीवन की कामना करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
33. जीवित्पुत्रिका व्रत कथा
अब जीमूतवाहन-गरुड़-शंखचूड़ की कथा और आपके क्षेत्र में प्रचलित चील्हो-सियारिन की कथा का श्रवण करें।
जीमूतवाहन कथा का मूल प्रसंग राजा जीमूतवाहन द्वारा शंखचूड़ नाग की रक्षा के लिए स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत करने और बाद में गरुड़ से नागों की रक्षा का वर मांगने से संबंधित है।
व्रत-कथा परंपरा में चील्हो-सियारिन की कथा भी अलग अध्याय के रूप में मिलती है।
जीमूतवाहन और शंखचूड़ की कथा
पौराणिक परंपरा में जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा का संबंध राजा जीमूतवाहन से जोड़ा जाता है। उपलब्ध व्रत-कथा परंपरा में कथा की संरचना सूत, गौतम, धौम्य और द्रौपदी के संवाद से आगे बढ़ती है। इसे भविष्य पुराण और भविष्योत्तर पुराण की परंपरा से जोड़ा जाता है, हालांकि अलग-अलग प्रकाशित संस्करणों में कथा के विवरण और भाषा में अंतर मिलता है।
कथा के अनुसार महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद द्रौपदी अपने पुत्रों की मृत्यु से अत्यंत दुखी थीं। तब धौम्य ऋषि ने उन्हें संतान की दीर्घायु और रक्षा से संबंधित जीवित्पुत्रिका व्रत का विधान बताया।
कथा में आगे राजा जीमूतवाहन का प्रसंग आता है।
जीमूतवाहन अत्यंत दयालु, परोपकारी और त्यागी राजा थे। एक दिन वन में घूमते हुए उन्होंने एक वृद्धा को विलाप करते देखा।
जीमूतवाहन ने वृद्धा से रोने का कारण पूछा।
वृद्धा ने बताया कि नागों और पक्षीराज गरुड़ के बीच ऐसी व्यवस्था थी कि प्रतिदिन एक नाग गरुड़ के भोजन के लिए भेजा जाता था। उस दिन उसके पुत्र शंखचूड़ की बारी थी।
वृद्धा अपने इकलौते पुत्र की मृत्यु की आशंका से व्याकुल थी।
जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो गया।
उन्होंने वृद्धा को आश्वासन दिया कि उसके पुत्र को बचाया जाएगा और वे स्वयं शंखचूड़ के स्थान पर गरुड़ के सामने जाएंगे।
इसके बाद जीमूतवाहन ने शंखचूड़ से लाल वस्त्र लिया और स्वयं को उससे ढककर उस स्थान पर जाकर लेट गए, जहां गरुड़ नाग को लेने आने वाले थे।
कुछ समय बाद पक्षीराज गरुड़ वहां पहुंचे और लाल वस्त्र में ढके जीमूतवाहन को नाग समझकर अपने साथ ले गए।
गरुड़ ने जब उन्हें अपना भोजन बनाना शुरू किया तो उन्हें आश्चर्य हुआ। जिस प्राणी को उन्होंने नाग समझा था, वह भय से न तो चीख रहा था और न ही अपने बचाव के लिए संघर्ष कर रहा था।
गरुड़ ने पूछा कि वह वास्तव में कौन है।
तब जीमूतवाहन ने पूरा घटनाक्रम बताया और कहा कि वह किसी मां के इकलौते पुत्र की जान बचाने के लिए स्वयं यहां आए हैं।
जीमूतवाहन के इस त्याग से गरुड़ अत्यंत प्रभावित हुए।
उन्होंने उनका परिचय पूछा। जीमूतवाहन ने अपने माता-पिता और अपना परिचय दिया। इसके बाद गरुड़ ने उनसे वर मांगने को कहा।
जीमूतवाहन ने अपने लिए धन या राज्य नहीं मांगा। उन्होंने प्रार्थना की कि गरुड़ द्वारा पहले जिन नागों को मारा गया है, वे भी जीवित हो जाएं और आगे नागों का भक्षण बंद कर दिया जाए।
कथा के अनुसार गरुड़ ने उनकी इच्छा स्वीकार की और पहले मारे गए नागों को अमृत के प्रभाव से पुनर्जीवन मिला। इसी प्रसंग से जीवित्पुत्रिका व्रत की महिमा जुड़ी मानी जाती है।
चील्हो-सियारो की कथा
जीवित्पुत्रिका व्रत की लोकपरंपरा में चील्हो-सियारो की कथा भी सुनाई जाती है।
कथा के अनुसार दो सखियां इस व्रत को करती थीं। एक ने व्रत को पूर्ण नियम और निष्ठा से किया, जबकि दूसरी भूख-प्यास से व्याकुल होकर व्रत के नियम से विचलित हो गई।
समय बीतने के बाद दोनों ने पुनर्जन्म लिया।
जिसने व्रत पूरी निष्ठा से किया था, उसकी संतान जीवित और सुखी रही, जबकि दूसरी की संतान बार-बार मृत्यु को प्राप्त होती रही।
तब दोनों के पूर्वजन्म का संबंध सामने आया। उसे पता चला कि पूर्वजन्म में व्रत के नियमों का पूर्ण पालन न करने के कारण उसके साथ ऐसा हुआ।
इसके बाद उसने भी श्रद्धा और नियमपूर्वक जीवित्पुत्रिका व्रत करना शुरू किया और कथा के अनुसार उसकी संतानों को दीर्घ जीवन प्राप्त हुआ।
इस कथा का मूल संदेश व्रत में संयम, श्रद्धा और नियम के पालन से जुड़ा है।
34. कथा के बाद विशेष प्रार्थना
दोनों हाथ जोड़कर—
हे भगवान जीमूतवाहन!
हे करुणामय महात्मन्!
हे जीवित्पुत्रिका व्रत के अधिष्ठाता!
जिस प्रकार आपने शंखचूड़ नाग के प्राणों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का त्याग करने का संकल्प लिया, उसी प्रकार मेरी संतानों पर भी अपनी कृपा बनाए रखें।
मेरे पुत्र-पुत्रियों को दीर्घायु, आरोग्य, सद्बुद्धि, यश और सुख प्रदान करें।
उनके जीवन से सभी संकट दूर हों।
सभी संतानों की रक्षा हो।
परिवार में शांति और मंगल बना रहे।
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
35. पुष्पांजलि
हाथ में फूल और अक्षत लें—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
सर्वसन्तानरक्षार्थं
दीर्घायुरारोग्यसिद्ध्यर्थं
पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।
फूल अर्पित करें।
36. प्रदक्षिणा
यथाशक्ति तीन या सात बार पूजा-स्थान की प्रदक्षिणा करें।
मन में—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
का जाप करें।
37. नमस्कार
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्रीप्रभो जीमूतवाहन॥
यहां अंतिम पंक्ति को जितिया पूजा के संदर्भ में प्रार्थना के रूप में रखा जा रहा है; इसे किसी मूल शास्त्रीय जितिया मंत्र के रूप में उद्धृत नहीं किया जा रहा।
38. क्षमा-प्रार्थना
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं
भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव
परिपूर्णं तदस्तु मे॥
फिर—
अपराधसहस्राणि
क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा
क्षमस्व परमेश्वर॥
39. आरती
उपलब्ध जितिया पूजा-स्रोतों में “ॐ जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन” से आरंभ होने वाली आरती प्रकाशित है।
आरती के समय दीप घुमाते हुए इसका पाठ किया जा सकता है।
ॐ जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन।
त्रिभुवन तिमिर निकंदन, भक्त हृदय चन्दन॥
सप्त अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी।
दुःखहारी सुखकारी, मानस मलहारी॥
सुर मुनि भूसुर वन्दित, विमल विभवशाली।
अघ-दल-दलन दिवाकर, दिव्य किरण माली॥
सकल सुकर्म प्रसविता, सविता शुभकारी।
विश्व विलोचन मोचन, भव-बंधन भारी॥
कमल समूह विकासक, नाशक त्रय तापा।
सेवत सहज हरत अति, मनसिज संतापा॥
इसके बाद पुनः—
ॐ जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन॥
40. अंतिम प्रार्थना
सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥
फिर—
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
41. पूजा समाप्ति मंत्र
ॐ तत्सत्।
ब्रह्मार्पणमस्तु।
श्रीजीमूतवाहनदेवाय नमः।
इसके साथ मुख्य पूजा पूर्ण मानी जा सकती है।
42. अगले दिन पारण
जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण नवमी तिथि में स्थानीय पंचांग के निर्धारित पारण समय के अनुसार किया जाना चाहिए। 2026 के लिए उपलब्ध पंचांग-आधारित प्रकाशित जानकारी में 4 अक्टूबर को पारण बताया गया है, लेकिन सटीक समय स्थानानुसार देखना चाहिए।
पारण से पहले भगवान जीमूतवाहन को प्रणाम करके—
ॐ जीमूतवाहनाय नमः।
व्रतस्यास्य पारणं करिष्ये।
मम सन्तानानां दीर्घायुरारोग्यसुखसमृद्धिर्भवतु।
कहकर जल ग्रहण करें और फिर अपनी परंपरा के अनुसार भोजन करें।
दैनिक भारतवर्ष की नजर में
इसे प्रकाशित करते समय “हर सामग्री का यही शास्त्रीय जितिया-मंत्र है” ऐसा दावा करने की सलाह नहीं दी जा रही है। उपलब्ध स्रोतों में जीमूतवाहन पूजा, चील्हो-सियारिन, सिंदूर, अक्षत, चंदन, दूर्वा, धूप-दीप और नैवेद्य आदि का विधान मिलता है, लेकिन प्रत्येक वस्तु के लिए अलग प्राचीन जितिया-मंत्र का प्रमाण एक समान नहीं मिलता। ऊपर दिए गए “ॐ जीमूतवाहनाय नमः + अर्पण” वाले मंत्र इसी कारण सुरक्षित, सरल और घरेलू पूजा के लिए उपयोगी रूप में दिए गए हैं।















