उमर अब्दुल्ला सरकार 2027 के बजट सत्र में पंजाबी, गोजरी और पहाड़ी भाषाओं पर विधेयक लाने का आश्वासन दे चुकी है; अब विधानसभा में प्रस्ताव पेश होने और पारित होने पर टिकी नजरें
श्रीनगर/जम्मू। जम्मू-कश्मीर में पंजाबी भाषा को आधिकारिक दर्जा देने की मांग को लेकर चल रहा आंदोलन सरकार की ओर से लिखित आश्वासन मिलने के बाद समाप्त हो गया है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व वाली सरकार की ओर से कहा गया है कि 2027 के बजट सत्र में विधानसभा के समक्ष इस संबंध में विधेयक पेश किया जाएगा। इस पहल में पंजाबी के साथ गोजरी और पहाड़ी भाषाओं को भी आधिकारिक भाषा का दर्जा देने का प्रस्ताव शामिल बताया गया है।
15 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, नेशनल कॉन्फ्रेंस के कोषाध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य शम्मी ओबरॉय ने सिख समुदाय के प्रतिनिधियों को लिखित आश्वासन दिया। इसके बाद जम्मू में चल रहा पंजाबी भाषा मोर्चा समाप्त करने की घोषणा की गई। आंदोलन करीब 14 दिनों से जारी था।
14 दिन तक चला धरना, लिखित आश्वासन के बाद खत्म हुआ आंदोलन
पंजाबी को जम्मू-कश्मीर की आधिकारिक भाषाओं में शामिल करने की मांग को लेकर सिख समुदाय के सदस्यों ने जम्मू में तवी पुल के पास महाराजा हरि सिंह की प्रतिमा के निकट धरना दिया था। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि पंजाबी भाषा को भी वही कानूनी मान्यता मिले जो केंद्र शासित प्रदेश की मौजूदा आधिकारिक भाषाओं को प्राप्त है।
इस आंदोलन में सिख संगत के प्रतिनिधियों, युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों ने भाग लिया। प्रदर्शनकारियों ने भाषा की मान्यता को समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और भाषाई अधिकारों से जुड़ा विषय बताया।
14 अक्टूबर को श्रीनगर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रतिनिधियों और सिख समुदाय के प्रतिनिधिमंडल के बीच बातचीत हुई। इसके बाद अगले बजट सत्र में विधेयक लाने का लिखित आश्वासन दिया गया। इसी घटनाक्रम के बाद आंदोलन वापस लेने का फैसला सामने आया।
शम्मी ओबरॉय ने क्या आश्वासन दिया?
नेशनल कॉन्फ्रेंस के राज्यसभा सदस्य शम्मी ओबरॉय ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार की ओर से पंजाबी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि आगामी बजट सत्र में भाषा की आधिकारिक स्थिति और उसके क्रियान्वयन से संबंधित व्यापक विधेयक पेश किया जाएगा।
रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने विधानसभा में विधेयक पारित कराने और उसे लागू करने की दिशा में प्रयास करने का भी आश्वासन दिया। नेशनल कॉन्फ्रेंस के 2024 के विधानसभा चुनाव घोषणापत्र में भी पंजाबी को आधिकारिक भाषा का दर्जा देने का वादा शामिल था।
हालांकि, इस घोषणा को कानून में बदलाव के बराबर नहीं माना जा सकता। विधेयक का औपचारिक रूप से पेश होना, विधानसभा से पारित होना और संबंधित कानूनी प्रक्रिया पूरी होना अभी महत्वपूर्ण अगले चरण हैं।
पंजाबी के साथ गोजरी और पहाड़ी भाषा भी प्रस्ताव में शामिल
इस घटनाक्रम का दायरा पंजाबी भाषा से आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। 15 अक्टूबर को प्रकाशित कुछ रिपोर्टों में बताया गया कि सरकार पंजाबी के साथ गोजरी और पहाड़ी को भी आधिकारिक भाषाओं की सूची में शामिल करने के लिए विधेयक लाने की तैयारी कर रही है।
इन भाषाओं को आधिकारिक मान्यता मिलने पर प्रशासनिक कामकाज, संस्थागत उपयोग और भाषाई-सांस्कृतिक पहचान के क्षेत्र में आगे की संभावनाएं खुल सकती हैं। लेकिन इनके वास्तविक उपयोग का दायरा प्रस्तावित विधेयक के प्रावधानों और उसके लागू होने के तरीके पर निर्भर करेगा।
अभी जम्मू-कश्मीर में कौन-कौन सी आधिकारिक भाषाएं हैं?
जम्मू-कश्मीर आधिकारिक भाषा अधिनियम, 2020 के तहत फिलहाल पांच भाषाओं को आधिकारिक मान्यता प्राप्त है:
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उर्दू
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कश्मीरी
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डोगरी
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हिंदी
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अंग्रेजी
इसी कानूनी व्यवस्था में पंजाबी, गोजरी और पहाड़ी भाषाओं के प्रचार-प्रसार तथा विकास के लिए विशेष प्रयासों का प्रावधान भी है। हालांकि, इन्हें वर्तमान आधिकारिक भाषाओं की सूची में शामिल नहीं किया गया है।
प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य इन भाषाओं की स्थिति को कानूनी स्तर पर आगे बढ़ाना है। इसके लिए विधानसभा में विधायी प्रक्रिया पूरी करना आवश्यक होगा।
सिख समुदाय की अन्य मांगें भी चर्चा में
पंजाबी को आधिकारिक भाषा का दर्जा देने के साथ सिख समुदाय की कुछ अन्य मांगें भी रिपोर्टों में सामने आई हैं। इनमें स्कूलों में पांचवीं कक्षा तक पंजाबी की पढ़ाई, पंजाबी शिक्षकों के रिक्त पदों को भरना, सिख सलाहकार बोर्ड का गठन और महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा के लिए भूमि आवंटित करने जैसी मांगें शामिल हैं।
इन मांगों पर आगे क्या निर्णय लिया जाता है, यह संबंधित सरकारी कदमों और आधिकारिक घोषणाओं से स्पष्ट होगा। उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि इन सभी मुद्दों पर अंतिम निर्णय हो चुका है।
आगे क्या होगा?
अब इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम 2027 का बजट सत्र होगा। यदि प्रस्तावित विधेयक विधानसभा में पेश किया जाता है और आवश्यक प्रक्रिया के बाद पारित होता है, तो पंजाबी, गोजरी और पहाड़ी भाषाओं को आधिकारिक दर्जा देने की दिशा में कानूनी बदलाव संभव होगा।
फिलहाल, आंदोलन की समाप्ति और सरकार का लिखित आश्वासन इस मांग पर बातचीत में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। लेकिन भाषाओं को आधिकारिक मान्यता मिलने का अंतिम निष्कर्ष विधेयक की वास्तविक स्थिति और कानून बनने के बाद ही निकाला जा सकेगा।















